गांधी के जीवन में नैतिकता सर्वोपरि: चिन्मय | New India Times

मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

गांधी के जीवन में नैतिकता सर्वोपरि: चिन्मय | New India Times

गांधी शांति समिति एवं सर्वोदय मंडल के तत्वाधान में बुरहानपुर में गांधी चर्चा का आयोजन गांधी भवन में किया गया, जिस की शुरुआत महात्मा गांधी के छायाचित्र पर सूतांजलि से हुई। युवा सर्वोदय साथी द्वय अंकित मिश्रा व मोहन दीक्षित के नेतृत्व में सर्वधर्म प्रार्थना ने गांधी चर्चा को सर्वधर्म समावेशी बनाया। कार्यक्रम में नगर के प्रबुद्धजन, समाजसेवी, साहित्यकार  व गांधीजनों के साथ साहित्यकार श्री विरेन्द्र निर्झर,श्री रमेश शुक्ला, मुकेश राजे, समाज सेवी महेन्द्र जैन, पत्रकार रामप्रकाश जायसवाल, प्रसिद्ध लेखक व कवि, कला रत्न, साहित्य शिरोमणि ठाकुर वीरेंद्र सिंह चित्रकार,श्री सत्य प्रकाश कपुर, सामाजिक कार्यकर्ता श्री विरेन्द्र गौतम, श्री दिनेश पवार, श्री आशिष भगत ,श्री शिवचरण शर्मा, विजय अयरे, चन्द्रकान्त पाटीदार, नितिन सहगल,कैलाश जयवन्त, संजय सिंह शिन्दे सहित अनेक गांधीजनों ने मध्य प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष, लेखक व चिंतक चिन्मय मिश्र एव विशेष अतिथि ब्रम्हाकुमारी आश्रम की दीदी सुश्री सुधा दीदी का सामूहिक स्वागत एवं अभिनंदन किया।

स्वागत उद्बोधन में गांधीवादी विचारक एवं अधिवक्ता दिलीप तायडे ने अतिथियों का परिचय देते हुए प्रेम और भाईचारा और शान्ति पूर्ण अहिंसक समाज बनाने की गांधी और विनोबा के सर्वोदय की आवश्यकता बताई।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता के तौर पर संबोधित करते हुए चिन्मय मिश्र ने कहा कि महात्मा गांधी ने विचारों का अतिक्रमण किया है। इसलिए गांधी कोई विचार है ही नहीं वह तो आचरण है और इसी आचरण से नैतिक बल आता है, जो महात्मा गांधी के जीवन में सर्वोपरि था। महात्मा गाँधी कहते थे कि इसमें मेरा कुछ भी मौलिक नहीं है यह सब तो मुझे इसी संस्कृति से मिला है. आगे उन्होंने कहा कि बुरहानपुर वह जगह है जहां गांधी विचार के अनुकूल सभी धर्म मिलकर रहते थे. यहां सिख समाज का प्रसिद्ध गुरुद्वारा भी है तो मुमताज की कब्र भी और ताप्ती का पवित्र किनारा. हमें अपने इस इतिहास को समझना होगा. इतिहास का केवल अतीत नहीं होता बल्कि उसका वर्तमान भी होता है. आज इस जगह का वर्तमान सर्वधर्म समभाव है, यदि यह नहीं बचा तो देश नहीं बचेगा, हमारा धर्म पड़ोसी धर्म है यदि हम कट्टरता की तरफ गए तो इस देश की बुनियाद ख़त्म हो जाएगी।

उन्होंने पूजा व प्रार्थना पद्धति की मौलिकता के साथ महात्मा गांधी की सादगीपूर्ण संयमित जीवन शैली पर बात की. उन्होंने विनोबा भावे का उद्धरण रेखांकित करते हुए कहा कि अहिंसा तो समाज की मांग थी। यदि गांधी नहीं होते तब भी कोई और अहिंसा की बात करता लेकिन गांधी की सबसे बड़ी खोज खादी है, जब हम पश्चिमी सभ्यता में पूर्ण तरीके से रच बस गए थे तब गांधी ने खादी पहनना सिखाया. वह खादी को हथियार के रूप में समाज के बीच में लाए। चरखा एक मशीन थी जो लोगों के आत्म बल के विकास में सहायक था और वह ऐसी सभी मशीनों के पक्षधर भी थे. वह कहते हैं कि गांधी के इसी पहनावे पर 30 किताबें लिखी जाती और उनके पास 26 प्रकार की स्किल थी. मूल बात यह है कि वह 66 साल की उम्र में भी साबरमती से निकाल दिए जाने पर सेवाग्राम बसाते. यह मानसिक ताकत उनके सेंस ऑफ ह्यूमर की परिचायक है।

यही ताकत गांधी को कभी हार मानने की स्वीकृति नहीं देती थी. इसलिए वह दोस्त से ज्यादा दुश्मन से प्यार करते और अंग्रेजों को भारत से मित्र बनाकर विदा करते. उन्होंने अंत में बुरहानपुर की तहज़ीब को जीवंत रखने, सर्वोदय समाज बनाने का आव्हान किया। उन्होंने कहा सर्वोदय का काम जल्दबाजी का काम नहीं। परिणाम मूलक हो,यह भी जरूरी नहीं है। लेकिन दुनिया का सबसे ज़रूरी काम है, जिसकी गुंजाइश आज बुरहानपुर जैसे शहर में है भी। कार्यक्रम मे सेवासदन महाविध्यालय के छात्रों ने भी गांधी विचार पर अपना भाषण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन शिक्षाविद संजय गुप्ता ने किया। कार्यक्रम का समापन युवा सर्वोदयी द्वय मोहन दीक्षित व अंकित मिश्रा द्वारा जय जगत जीत के सामूहिक स्वर के साथ हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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