दहेज प्रथा से मुक्त विवाह का हुआ आयोजन, लोगों ने की सराहना | New India Times

पंकज शर्मा, ब्यूरो चीफ, धार (मप्र), NIT:

दहेज प्रथा से मुक्त विवाह का हुआ आयोजन, लोगों ने की सराहना | New India Times

वर्तमान में कई समाजों में विवाह के दौरान दहेज प्रथा की रीति का जोरों से पालन हो रहा हैं जो की बेटी के पिता पर बोझ के रूप में है। पिता बेटी के विवाह में अपनी विपरीत परिस्थितियों में भी बेटी को लाखों रूपए का दहेज देकर बेटी के ससुराल परिवार को खुश करते नजर आते हैं। शादीयों में दहेज को देखने के लिए लोगों की होड़-सी लगी रहती है। जिसका समाज में गलत प्रभाव पड़ रहा है। इस दिखावटी दूनिया में बेटी का पिता अपनी संपत्ति बेचने को भी मजबूर हो जाता है। परन्तु शनिवार को घाटाबिल्लौद के निजी गार्डन में आयोजित विवाह में दहेज प्रथा को समाप्त करने को लेकर एक सकारात्मक पहल की गई। पहल इन्दौर जिले देपालपुर तहसील अंतर्गत ग्राम अहिरवास के युवा कान्हासिंह सोलंकी पिता स्व. बहादुरसिंह सोलंकी ने विवाह में दहेज ना लेते हुए सिर्फ नारियल स्वीकार किया‌ तथा आयोजन में शामिल होने आए लोगों को दहेज प्रथा बन्द का सकारात्मक संदेश दिया गया। यह देख लोग क कान्हासिंह सोलंकी अहिरवास व उनके स्वजनों की सराहना करने लगे‌। विवाह पश्चात दुल्हन पुजाकुंवर का दुल्हे की माताजी ने पुत्रवधु के रूप में स्वीकार कर घर में फुल बिछाकर आगमन कराया। दुल्हे कान्हासिंह ने कहा की समाज में दहेज प्रथा की एक रीत कई वर्षों से चली आ रही है। जो की बेटी परिवार के लिए बोझ है। एक पिता अपनी बेटी की खुशियों के लिए अच्छा घर-परिवार ढुढ़ता है परन्तु इसके लिए उसे दहेज प्रथा का शिकार होना पड़ता है। वह जीवन भर की कमाई बेटी के विवाह में खर्च कर स्वयं विषम परिस्थितियों का सामना करता है। मैंने सगाई के पहले ही दहेज ना लेने का संकल्प लिया था जिसे अपने विवाह आयोजन में पूरा किया है। किसी भी सकारात्मक पहल की शुरुआत अगर हम व्यक्तिगत रूप से करेंगे तो समाज में दहेज प्रथा बन्द हो जाएगी। लोग बेटियों को बोझ नहीं समझेगें। साथ ही बेटा-बेटी एक समान का प्रयास पूरा होगा।

20 वर्ष की उम्र में पिता को खोया, खुद पर आया परिवार का बोझ

कान्हासिंह सोलंकी के पिता स्व.बहादुरसिंह सोलंकी का सन् 2021 में देहांत हो गया था‌। जब कान्हा की उम्र 20 वर्ष थी‌। पिता को खोने के बाद परिवार की जिम्मेदारी कान्हा के कन्धों पर आ गई। कान्हा पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सामाजिक सरोकार के कार्यो में भी अग्रणी रहे हैं। वह बताते हैं कि मैंने जब वास्तविकता को देखा तो दहेज नही लेने का निर्णय लिया।

कान्हा के जिजाजी ने भी दहेज प्रथा बन्द का किया पालन

कान्हा की छोटी बहन स्वाति कुंवर से विवाह के लिए खेड़ीसिहोंद से बारात लेकर आए गौरवसिंह मोर्य ने भी साले कान्हा की अनुकरणीय पहल का समर्थन करते हुए दहेज नहीं लिया। यह विवाह चर्चा का विषय बन चुका है।

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