मेघनगर अनुविभागीय अधिकारी एवं थाना प्रभारी ने भगोरिया मेला क्षेत्र का किया औचक निरीक्षण | New India Times

रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

मेघनगर अनुविभागीय अधिकारी एवं थाना प्रभारी ने भगोरिया मेला क्षेत्र का किया औचक निरीक्षण | New India Times

मेघनगर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व श्री मुकेश सोनी एवं थाना प्रभारी ने मेघनगर भगोरिया क्षेत्र का औचक निरीक्षण किया एवं सफल आयोजन के लिए निर्देश दिये गये। मेघनगर दशहरा मैदान मेला क्षेत्र में निरीक्षण के दौरान नगरवासियों से भगोरिया संबंधित चर्चा भी की गई। इस दौरान अनुविभागीय अधिकारी राजस्व श्री मुकेश सोनी, नयाब तहसीलदार मृदुला सचवानी, थाना प्रभारी श्री रमेशचंद्र भास्करे, नगर परिषद अधिकारी श्री राहुल सिंह वर्मा, राजा टाक आदी की उपस्थित में निरीक्षण किया गया। उत्साह उमंग का पर्व भगौरिया आदिवासी जन जीवन का एक जीता जागता स्वरूप है। जिसमें आदिवासी जन
की अल्हडता, मादकता, सौंदर्यता, नृत्य कल संगीत,  एक साथ देखने को मिलता है।

इसी का नाम है उत्साह एवं उमंग का त्यौहार भगौरिया। भगोरिया मतलब भौंगर्या, आदिवासीयों का प्रणय पर्व, फसल पकने का त्यौहार, रंगों का त्यौहार। भगौरिया हाट बाजार मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ, आलिराजपुर, धार जिले सहित निमाड के बडवानी, खरगौन, खंडवा एवं महाराष्ट्र के अमरावती जिले में भी मनाया जाता है।
भगौरिय हाट का इंतजार आदिवासी समुदाय साल भर करता है, अपने इस खास पसंदीदा त्यौहार को लेकर साल भर उत्सुकता बनी रहती है इसके लिये वो काम की तलाश में देश भर मे कहीं भी गया हो भगौरिया के लिये अपने गांव घर जरूर लौट आता है जैसे एक पक्षी शाम ढलते ही अपने घौंसलों में लौट आता है।

भगौरिया हाट में काम की तलाश में बहार गये आदिवासी जन जब अपने गांव, फलिये में लौटते हैं तो इन ग्रामीण क्षेत्रों के फलियों, मजरों, टोलों की रौनक बढ़ जाती है। टापरे-टापरे खुब चहल पहल होती है रौनक आ जाती है आदिवासी जन अपने घर आंगन में ढोल मादल की थाप एवं थाली की खनखनाहट पर खूब नाचते हैं। भगोरिया हाट बाजार होली के एक सप्ताह पूर्व भरने वाले साप्ताहिक हाट बाज़ार ही होते हैं लेकिन उनकी रौनक आम हाट बाजारों से कई ज्यादा खास होती है। भगौरिया हाट में जाने के लिये बड़े, बुजुर्ग, बच्चे, युवा, युवलियां, महिलाएं हर कोई भागोरिया के लिए उत्साहीत रहता है। एक महिने पहले से ही आदिवासी जन जीवन भगौरिया की तैयारियों में जुट जाता है, युवक युवतिया नये परिधान सिलवाते है, श्रृंगार करते है तो युवा आदिवासी बंसी की धुन छेडता है, आदिवासी जन ढोल मांदल कसने लग जाते है। चारों और उत्साह एवं उमंग का वातावरण रहता है।

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