मध्य प्रदेश के सरकारी जिला हॉस्पिटलों को पीपीपी मॉडल पर निजीकरण के खिलाफ एस यू सी आई (कम्युनिस्ट) पार्टी द्वारा हमीदिया हॉस्पिटल के सामने किया गया विरोध प्रदर्शन | New India Times

अबरार अहमद खान/मुकीज खान, भोपाल (मप्र), NIT:

मध्य प्रदेश के सरकारी जिला हॉस्पिटलों को पीपीपी मॉडल पर निजीकरण के खिलाफ एस यू सी आई (कम्युनिस्ट) पार्टी द्वारा हमीदिया हॉस्पिटल के सामने किया गया विरोध प्रदर्शन | New India Times

मध्य प्रदेश के सरकारी जिला अस्पतालों के निजीकरण के खिलाफ  एस यू सी आई (कम्युनिस्ट) पार्टी द्वारा हमीदिया हॉस्पिटल के सामने विरोध प्रदर्शन किया गया। इस मौके पर प्रदर्शन को संबोधित करते हुए एस. यू.सी.आई(कम्युनिस्ट) के राज्य सचिन मंडल सदस्य कॉ.सुनील गोपाल ने कहा की यह निर्णय घोर जनविरोधी  है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिए गए निर्णय अनुसार मेडिकल कॉलेज सहित तमाम जिलों में निजी निवेशकों को मेडिकल कॉलेज बनाने हेतु सस्ते दामों पर, जमीन उपलब्ध कराने के साथ ही, उक्त निजी मेडिकल कॉलेज से शहर के उन सरकारी जिला अस्पतालों को जोड़ा जाना है, जिनमें 300 विस्तरों की सुविधा मौजूद है। साथ ही ऐसे अस्पतालों के स्टाफ की सैलरी भी निजी निवेशकों द्वारा ही देय होगी। कॉ.सुनील गोपाल ने इस निर्णय की घोर निंदा करते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश सरकार आम जनता के हितों की पूर्ण अनदेखी करते हुए, केन्द्र सरकार के नीति आयोग द्वारा साल 2020 में दिए गये इस प्रस्ताव को आंख मूंदकर लागू कर रही है। इसी प्रस्ताव में यह कहा गया था कि जिला अस्पताल ऐसे निजी निवेशकों को 60 साल के लिए दिये जायेंगे एवं इन्हें निजी मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार भले ही दिखाने के लिए यह कर रही है कि निजी हाथों में दिए जा रहे सरकारी अस्पतालों में 75% बेड गरीबों के लिये आरक्षित होंगे एवं 25 % बिस्तरों पर निजी ऑपरेटर को शुल्क वसूलने का अधिकार होगा लेकिन पिछले अनुभवों बताते हैं कि यह शुरुआत में केवल दिखावे के लिए रखा गया प्रावधान है और अंततोगत्वा आमजनता की गाढ़ी कमाई से बने ये सरकारी उपक्रम भी निजी मालिकों के क्रूर और अमानवीय मुनाफे की भेंट चढ़ जाएंगे। उन्होंने कहा कि एस. यू.सी.आई (कम्युनिस्ट) ने प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के निजीकरण की आशंका बहुत पहले तभी व्यक्त कर दी थी जब प्रदेश में डॉक्टर और मेडिकल स्टॉफ के पद निरंतर खाली रखे जा रहे थे और केवल अस्पतालों की इमारतों पर पैसा खर्च किया जा रहा था। निजीकरण की ये कोशिश नई नहीं है, 2015 में भी, भाजपा सरकार ने 27 जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने का प्रस्ताव रखा था।  दीपक फाउंडेशन नाम के निजी समूह को अलीराजपुर जिला अस्पताल हैंडओवर कर भी दिया गया था। इसके परिणाम से स्पष्ट हो गया, कि कैसे उक्त निजी समूह ने डॉक्टरों और स्टाफ की नियुक्ति न कर किस तरह आदिवासी बहुल जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था ठप कर दी। परिणामस्वरूप नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट सफल प्रयोग  के रूप में उक्त प्रोजेक्ट उल्लेख करना ही छोड़ दिया था
उन्होंने कहा कि एक ऐसा प्रदेश जिसमें एक तिहाई जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे बसर करती है। साथ ही जहाँ कुपोषित शिशुओं और मातृ मृत्यु दर की संख्या देश में सबसे ज्यादा है, वहां जनता की जीवनरक्षा हेतु  उपलब्ध न्यूनतम राहत का जरिया रहे  इन सरकारी अस्पतालों का भी निजीकरण करने से प्रदेश का गरीब और मध्यमवर्गीय तबका इलाज से पूरी तरह महरूम हो जायेगा और वे मुनाफे के भूखे भेड़ियों के हाथों निर्मम शोषण को मजबूर होंगे। वर्तमान मोहन यादव सरकार बनते ही जिस प्रकार चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग को एक कर दिया गया, उससे भी सरकार की मंशा स्पष्ट प्रकट होती है। उन्होंने राज्य सरकार से इस निर्णय को अविलंब वापस लेने की माँग की है और प्रदेश की आम जनता से अपील की है, कि इस घोर जनविरोधी और पूंजीपति परस्त निर्णय के खिलाफ संगठित विरोध दर्ज कर सरकार को इसे वापस लेने पर मजबूर करें।

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