परम पूज्य भाउराव देवरस व वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की जयन्ती का मनाया गया कार्यक्रम | New India Times

वी.के. त्रिवेदी, ब्यूरो चीफ, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT:

परम पूज्य भाउराव देवरस व वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की जयन्ती का मनाया गया कार्यक्रम | New India Times

विद्या भारती विद्यालय पं0 दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मन्दिर इण्टर कालेज यू.पी.बोर्ड, लखीमपुर खीरी में प0 पू0 भाउराव देवरस व वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी की जयन्ती का कार्यक्रम मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ विद्यालय के प्रथम सहायक कुन्तीश अग्रवाल ने माँ सरस्वती, भाउराव देवरस व रानी लक्ष्मीबाई के चित्र पर दीप प्रज्वलन व पुष्पार्चन कर किया। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने गीत व वक्तव्य प्रस्तुत किये। तुषार वर्मा, सौरभ वर्मा व सोहम मिश्रा ने अंग्रेजी वक्तव्य प्रस्तुत किये तथा अंश मिश्रा ने सिंहासन हिल उठे कविता प्रस्तुत की।विद्यालय के आचार्य देवानंद पाण्डेय ने छात्राओं को बताया कि रानी लक्ष्मीबाई वह नाम है जो भारतीय इतिहास में अमर हैं और रहेगा, इनका जन्म 19 नवम्बर सन 1828 को एक मराठा परिवार में पावन नगरी बनारस में हुआ था। इनका बचपन का नाम मणि कर्णिका था।

सन 1842 में इनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ कुछ दिनों बाद इनको पुत्र प्राप्ति हुई उसका नाम दामोदर राव रखा गया। जन्म के कुछ दिनों बाद ही पुत्र की मृत्यु हो गयी तब इन्होंने एक पुत्र को गोद लिया और उसका नाम भी दामोदर राव रखा परन्तु अंग्रेजों ने कहा कि दत्तक पुत्र को राजा नहीं बना सकते तब रानी ने लंदन में एक मुकदमा डाला कि मेरे पुत्र को राजा की मान्यता दी जाए परन्तु लंदन में अंग्रेजों ने उनके मुकदमे को खारिज कर दिया। जब रानी ने अपना राज्य अंग्रेजों को देने से मनाकर दिया तब अंग्रेजों ने इनके राज्य पर हमला कर दिया। इनके तीन घोड़े थे सारंगी, पवन और बादल जोकि ट्रेन्ड थे। रानी को घुड़सवारी का बचपन से शौक था इन्होंने अपने रण कौशल से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। अन्त में रानी को वीरगति प्राप्ति हुई। इनके युद्ध के लड़ाई कौशल को ही सुभद्रा कुमारी चौहान ने कविता लिखी- खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी, इसके बाद आचार्य रामप्रकाश अवस्थी जी ने बताया कि महापुरूष भाउराव देवरस जी ने सेवा कार्य से अपना नाम अमर किया। उन्होंने समाज सेवा, देश सेवा तथा भारत माँ की सेवा से अपना नाम इतिहास में अमर किया है।

इनका जन्म 1919 को नागपुर के इतवारी मोहल्ले में हुआ था। इनके पिता दत्तात्रेय जी एक अधिकारी थे। इनका पूरा नाम मुरलीधर दत्तात्रेय देवरस था। इन्हें स्नातक के बाद लखनऊ में संघ के कार्य तथा विस्तार हेतु भेजा गया। इन्हें संघ के कार्य हेतु बिहार भी भेजा गया। इन्होंने अभाव ग्रस्त लोगों की सेवा की तथा उन्हें समाज में आगे बढ़ाया। फिर इन्हें दिल्ली भेजा गया तथा इनका मुख्यालय दिल्ली में बनाया गया। अभावग्रस्त लोगों के सेवा के कारण समाज में इनका नाम अमर हो गया। तत्पश्चात आचार्य हिमांशु रस्तोगी ने बताया कि भाउराव देवरस जी नें कहा कि दुनिया में छुआ-छूत यदि पाप नहीं है तो कुछ भी पाप नहीं है अर्थात् छुआ-छूत ही इस दुनिया का सबसे बड़ा पाप है अर्थात् हम सब हिन्दू हैं और समान हैं छुआ-छूत को समाज से समाप्त करना चाहिए। देवरस जी विद्यालयों में जा कर वहाँ के टापर बच्चों की सूची लेकर उन बच्चों के घर जाकर मिलते थे तथा उन लोगों को संघ की विचार धारा को बताते थे। कार्यक्रम के अन्त में विद्यालय के प्रथम सहायक कुन्तीश अग्रवाल नें सभी का आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर समस्त विद्यालय परिवार उपस्थित रहा।

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