फ्रिज क्रांति से कुर्बानी के गोश्त के उपयोग पर हुआ विपरीत असर | New India Times

अशफाक कायमखानी, जयपुर, NIT; ​फ्रिज क्रांति से कुर्बानी के गोश्त के उपयोग पर हुआ विपरीत असर | New India Timesहालांकि फ्रिज क्रांति के अनेक फायदे अक्सर गिनाये जाते हैं एवं दिन चर्या में हम महसूस भी करते आ रहे हैं, लेकिन इस्लामी शरीयत के मुताबिक साहिबे हैसियत पर कुर्बानी वाजिब होने के कारण उसके द्वारा इदुल अजहा के मौके पर अल्लाह के नाम उसकी तरफ से दी जाने वाली कुर्बानी के तहत खासतौर पर बकरे की कुर्बानी के करने पर उसके गोश्त को तीन हिस्सों में अलग अलग करके हुक्म-ऐ- रबूलआलमीन के मुताबिक उसका उपयोग जो पहले मुसलमान करता था उसके विपरीत अब फ्रिज क्रांति के जोड़ पकड़ने के कारण इससे इंसान ने अपने आप के मिजाज में बदलाव करके गरीब-मिस्कीन वाला हिस्सा अधिकांश लोग फ्रिज में रखकर उसका अगले कुछ दिनों तक उपयोग करने लगे हैं।

 हालांकि समाज मे फ्रिज क्रांति आने से पहले के मुकाबले आज के हालात में कुर्बानी करने वालों की तादात में कई गुना इजाफा हुआ है, लेकिन जो जब्बा पहले हकदारों को कुर्बानी गोश्त बांटने व दोस्त व अहबाब को खिलाने का हम लोगों में देखा जाता था उसमें उलटे कई गुणा अधिक कमी आना अधिकांस जगह देखने को मिलती है। हां कुछ लोग जरुर हुक्म-ऐ-रबूलआलमीन के मुताबिक गोश्त का जरुर सदुउपयोग करते हैं। ऐसे चंद नेक लोग गरीब-मिस्कीनों में उनका हिस्सा तक्सीम भी करते हैं और साथ ही इच्छुक दोस्त व अहबाब व रिश्तेदारों को बतौर खाना भी खिलाते हैं।

मुझे याद है कि जब मेरे वालदेन हयात थे तब हम ही नहीं सभी मोहल्ले व गावं वासी अपने अपने घरों में इदुल अजहा के कुछ दिन पहले बैठकर यह पुरी मालुमात करकर यह तय कर लेते थे कि किन किन के कुर्बानी है या नही। उस समय इस नेक रिवाज व आदत के चलते कुर्बानी करने वाले से अधिक गोश्त कुर्बान न करने वाले के घर अक्सर जमा हो जाता था। साथ ही हर गरीब-मिस्कीन तक भी उसका हिस्सा हर हालत में पहुंचाने की सभी की आदत शुमार होना आम बात थी। लेकिन आज के सामाजिक परिवेश में यह पूरी तरह बदला बदला नजर आने लगा है।

हालांकि इस हालात में मेरी कुछ साहिबे हैसियत रखने वाले लोगों से बात हुई तो अनेको ने अलग अलग तर्क देते हुये कहा कि हम घर के अनेक लोग साहिबे हैसियत वाले होने के कारण कुछ लोग अन्यंत्र कुर्बानी का हिस्सा ले लेते हैं। तो दुसरी तरफ एक दो कुर्बानी घर पर करके उसका उपयोग घर मे ही कर लेते हैं। इसकी वास्तविक हकिकत व मसला तो उमला ए कराम जाने लेकिन इतना जरुर समझ में आता है कि हर कुर्बानी हर साहिबे हैसियत की तरफ से अलग अलग होती है। तो अलग अलग की तरफ से होने वाली अलग अलग कुर्बानी के हिस्से भी उसी तरह से करके उनको उपयोग मे लाना होगा। नाकि जैसे तीन में से दो कुर्बानी के अन्यंत्र हिस्से लेकर रकम अदा करदी ओर बाकी जो एक बकरे की कुर्बानी घर पर करके उसके गोस्त का उपयोग पुरी तरह घर में कर लिया।

कुल मिलाकर यह है कि कुर्बानी के गोस्त को लेकर समाज में आये मिजाजी बदलाव व फ्रिज क्रांति के चक्र में उनमें फ्रिज होते कुर्बानी गोस्त के चलन के चलते गरीब-मिस्कीन, पड़ोसी, रिश्तेदार व दोस्त अहबाब अक्सर पाक परवरदीगार से दुवा करते होंगे कि इदुल अजहा के मौके पर कुछ दिन बीजली electric बनवास पर चली जाये तो बेहतर होगा।

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