साबिर खान, मुंबई, NIT;
सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक के मुद्दे पर पांच सदस्यीय बेंच के जजों में से 5 में से 3 समर्थन और 2 असमर्थन में न्यायाधीशों ने यह फैसला सुनाया कि एक साथ तीन तलाक खत्म किया जाए और यह फैसला 6 महीने तक प्रक्रिया में रहेगा और इन्हीं 6 महीनों में केंद्र सरकार मुस्लिम उलेमाओं से सलाह करके कानून बनाए। न्यायाधीशों ने यह भी निर्णय दिया है कि एक साथ तीन तलाक कुरान शरीफ में कहीं मौजूद नहीं है।
प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने 365 पेज के फैसले में कहा, ‘‘3:2 के बहुमत से दर्ज की गयी अलग अलग राय के मद्देनजर ‘‘तलाक-ए-बिद्दत’’ तीन तलाक को निरस्त किया जाता है।’’
अवामी विकास पार्टी के अध्यक्ष व रिटायर्ड पुलिस अधिकारी शमशेर खान पठान ने प्रेस विज्ञप्ती जारी कर सख्त लहजे में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम समुदाय को शर्मशार करने का काम ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने किया है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक तो हमारे नबी के वक्त और हजरत उमर (रजी) के दौर में भी तीन तलाक को पाप माना गया था लेकिन इस बात को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुसलमानों तक पहुंचाया नहीं और तलाक के बारे में जो कुरान में लिखा गया है वह लोगों तक नहीं पहुंचाया जिसकी वजह से 99 फीसदी लोग तीन तलाक को ही तलाक समझते हैं, जिसकी वजह से कई महिलाएं इसकी शिकार हुईं और अपने पति से अलग हो गईं या जिन्हें हलाला जैसे गंदे काम से गुजरना पड़ा।
इसी बात को लेकर कुछ मुस्लिम महिलाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं, जिनका कहना था कि कुरान में तीन तलाक यानी एक साथ तीन तलाक देने का कहीं उल्लेख नहीं है और इस तरह के एक गैर कुरानी परंपरा को अपना कर महिलाओं का विवाहित जीवन बर्बाद हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को पार्टी बनाया गया और इस बात की चर्चा पूरे भारत में होती रही। लोगों ने तलाक के बारे में सही तथ्य जानने की कोशिश की और कुरान शरीफ तर्जुमा से पढ़ा और अधिकांश लोग इस बात से सहमत हो गए कि कुरान में एक साथ तीन तलाक देने के संबंध में कहीं नहीं लिखा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का यह कर्तव्य होना चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट में अपना सही मामला दर्ज करते लेकिन वह तीन तलाक को जायज़ बताते रहे और जब उनके इस बात की आलोचना होने लगी और मुस्लिम थोड़ा जागे तो उन्होंने यह भी कहा कि जो भी व्यक्ति एक साथ तीन तलाक देगा उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। फिर कुछ दिनों के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक और बात कही के भारत के सभी काजियों को यह हुकुमनामा जारी किया के निकाह के समय दूल्हे से कहा जाए कि अगर मिया बीवी के बीच कोई मतभेद आ जाए तो वह किसी भी मामले में एक साथ तीन तलाक न दें इस तरह से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दबे शब्दों में तीन तलाक का विरोध किया लेकिन स्पष्ट रूप से इस मामले में खुलकर नहीं आए। अगर वह उसी समय कोर्ट के सामने खुलकर कहते कि तीन तलाक सही नहीं है और आप इसे रोक रहे हैं तो सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई वहीं रुक गई होती लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
इस तरह से कोर्ट के सामने और पूरे भारत में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुसलमानों को शर्मशार किया और उसके जवाबदेह सभी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष और मेंबरान हैं। शमशेर खान पठान ने कहा कि सभी बुद्धिजीवी एक साथ मिल कर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भंग कर देना चाहिए और नए पढ़े लिखे और अनुभवी लोगों की नियुक्ति की जाए जो इस्लाम की सही शिक्षा लोगों तक पहुंचाएं। इसके लिए शमशेर खान पठान ने मौलाना वली रहमानी को जिम्मेदार ठहराया है कि उनकी वजह से लोगों को शर्मशार होना पड़ा। अगर मौलाना वली रहमानी के अंदर थोड़ी भी गैरत होगी तो वह आज ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से इस्तीफा दे देंगे अन्यथा उन्हें असम्मानित कर के निकाल दिया जाए। शमशेर खान पठान ने आगे कहा कि समान नागरिक संहिता के मामले में भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने गलत बयानी और गलत कदम उठाया और प्रत्येक नागरिक को अपनी बात लाॅ कमीशन को देने की बात होते हुए भी मौलाना वली रहमानी ने अपने नाम मंगवाया। इसकी कोई वैधता नहीं है, क्योंकि विधि आयोग लोगों के सामूहिक बात को अस्वीकार कर सकता है इस तरह आने वाले समय में समान नागरिक संहिता लागू होने तक ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा और अधिक नुकसान होने का संदेह है इसलिए इस मामले में आने वाले खतरे से बचने के लिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को तुरंत भंग होना चाहिए और दुबारा बोर्ड गठित करते वक्त तत्कालीन मेंबर्स को नहीं लिया जाना चाहिए।
