नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ़, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

जिले का नाम जलगांव लेकिन मानसून की बारिश का अब तक का औसत मात्र 300 मिलीमीटर इसे प्रकृति की विवेचना कह सकते हैं। मौसम के मिजाज़ के चलते जल के अभाव से सूखे की कगार पर आ पहुंचे जलगांव जिले की इस बदहाली के लिए जिम्मेदारी का दूसरा पहलू नेताओ की नाकामी भी है। बीते दस सालों से जलगांव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे जनता के ऊपर धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति को जबरन थोपा जा रहा है।

हमने NIT की अपनी 11अगस्त की रिपोर्ट में जिले के सभी 16 सिंचाई प्रकल्पों में जलभंडारण की वर्तमान स्थिती के बारे में अवगत कराया था। 12 टीएमसी क्षमता का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट वाघुर 6 टीएमसी तक आ पहुंचा है। हतनुर पूरा भरने के बाद भी गाद के कारण आधा ही भरता है। जिले के जलगांव लोकसभा क्षेत्र में आने वाले लगभग सभी डैम आने वाले चार महीनों में सुख जायेंगे। रावेर लोकसभा में स्थिति कुछ ठीक ठाक है। जलगांव ग्रामीण और जामनेर दोनों तहसीलों में 250 करोड़ रूपए की लागत से जलजीवन मिशन योजनाओं के काम शुरू हैं। आधे से अधिक काम ताबड़तोड़ निपटा दिए गए हैं, अब समस्या है पानी के लिफ्टिंग की। जलगांव ग्रामीण और जामनेर के गांवों के लिए वाघुर डैम और संबंधित विभागों से ग्राम पंचायतों द्वारा अब तक पेयजल का आरक्षण नहीं कराया गया है। इरिगेशन का महकमा राजनीतिक प्रभाव से आननफानन में आरक्षण फाइलों को हरी झंडी देने में लग चुका है। वाघुर से जामनेर के करीब 40 गांवों के लिए पानी रिजर्व करना पड़ेगा। इधर मंत्री गिरीश महाजन के निर्वाचन क्षेत्र जामनेर के कई गांवों को टैंकर से पीने का पानी पहुंचाया जा रहा है। जामनेर के सभी 160 गांवों के पेयजल स्कीमों पर तीस सालों में सरकारी तिजोरी से एक हजार करोड़ रूपए फूंक दिए जा चुके हैं।
जलजीवन पर खडसे का प्रहार
एनसीपी नेता एकनाथ खडसे ने जलजीवन मिशन योजनाओं के कार्यान्वयन को लेकर विधानसभा सत्र में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए थे जिसमें पानी के स्त्रोत को लेकर सरकार से जवाब मांगा था। खडसे द्वारा जलजीवन मिशन पर लगाए गए तमाम आरोप आज सूखे की चपेट में सच साबित होते नजर आ रहे हैं। नकली बीज से बर्बाद हुई फसलों की फिर से बुआई का खर्चा उठा चुके किसानों को सूखे ने परेशान कर रखा है।
