नहीं रहे पूर्व मुख्यमंत्री पहाड़िया: राजस्थान में शराबबंदी करने वाले पूर्व सीएम जगन्नाथ पहाड़िया का काेरोना से निधन, आज एक दिन का राजकीय शोक, सभी सरकारी दफ्तरों में छुट्‌टी | New India Times

अशफाक कायमखानी, ब्यूरो चीफ, जयपुर (राजस्थान), NIT:

नहीं रहे पूर्व मुख्यमंत्री पहाड़िया: राजस्थान में शराबबंदी करने वाले पूर्व सीएम जगन्नाथ पहाड़िया का काेरोना से निधन, आज एक दिन का राजकीय शोक, सभी सरकारी दफ्तरों में छुट्‌टी | New India Times

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और बिहार-हरियाणा के राज्यपाल रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जगन्नाथ पहाड़िया का कोरोना से निधन हो गया। पहाड़िया ने देर रात गुड़गांव के अस्पताल में अंतिम सांस ली। पहाड़िया के निधन पर राजस्थान सरकार ने एक दिन के राजकीय शोक और सरकारी दफ्तरों में छुट्टी की घोषणा की है। सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा। पहाड़िया का राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार होगा। आज दोपहर 12 बजे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद की बैठक बुलाई जिसमें पहाड़िया को श्रद्धांजलि दी गई.

पहाड़िया के निधन पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, विधानसभा स्पीकर सीपी जोशी, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया, पूर्व सीएम वसुंधरा राजे, पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट सहित कांग्रेस-भाजपा के कई नेताओं ने शोक जताया है।

पूरी तरह शराबबंदी लागू करने वाले पहले सीएम, चार बार सांसद, चार बार विधायक रहे
पहाड़िया 6 जून 1980 से 14 जुलाई 1981 तक मात्र 13 महीने ही राजस्थान के सीएम रहे। 13 महीने के छोटे से कार्यकाल में पहाड़िया ने प्रदेश में पूरी तरह शराबबंदी लागू की। पहाड़िया 1957, 67, 71 व 80 में चार बार सांसद और 1980, 1985, 1999 और 2003 में विधायक रहे। वे इंदिरा गांधी कैबिनेट में मंत्री भी रहे। उनके पास वित्त, उद्योग, श्रम, कृषि जैसे विभाग रहे। वे 1989 से 90 तक एक साल के लिए बिहार और 2009 से 2014 तक हरियाणा के राज्यपाल भी रहे।

पहाड़िया ने पंडित नेहरू को बेबाकी से कहा था- दलितों को रिप्रजेंटेशन ठीक से नहीं मिल रहा

जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान के एक मात्र दलित मुख्यमंत्री रहे हैं, उनसे पहले और उनके बाद कोई दलित नेता राजस्थान में सीएम नहीं बना। भरतपुर के भुसावर में एक दलित परिवार में पैदा हुए पहाड़िया शुरू से ही बेबाक थे। उनकी बेबाकी ही उनके राजनीति में आने का कारण बनी। बताया जाता है कि 1957 मेें उस समय के दिग्गज नेता मास्टर आदित्येंद्र जगन्नाथ पहाड़िया को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिलाने ले गए। उस वक्त पहाड़िया की उम्र केवल 25 साल थी। पंडित नेहरू ने युवा पहाड़िया से देश प्रदेश के हालात के बारे में पूछा। पहाड़िया ने बेबाकी से कहा था कि बाकी तो सब ठीक है लेकिन दलितों को रिप्रजेंटेशन नहीं मिल रहा। इस पर पंडित नेहरू ने उन्हें चुनाव लड़ने को कहा, वे तत्काल तैयार हो गए, 1957 के चुनाव में जो देश का दूसरा आम चुनाव था पहाड़िया सवाईमाधोपुर से सांसद का चुनाव जीते। इस तरह से पहाड़िया का चुनावी सफर शुरु हुआ था।

80 के दशक में कांग्रेस की एक बैठक में वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामनारायण चौधरी और जगन्नाथ पहाड़िया
80 के दशक में कांग्रेस की एक बैठक में वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामनारायण चौधरी और जगन्नाथ पहाड़िया
संजय गांधी के नजदीकी रहे, तेजी से कामयाब हुए लेकिन उतार चढ़ाव भी खूब देखे.

जगन्नाथ पहाड़िया संजय गांधी के बहुत करीब थे। उनके मुख्यमंत्री बनने का सबसे बड़ा कारण उनकी संजय गांधी से करीबी होना ही था। इंदिरा गांधी के भी नजदीक थे, संजय गांधी के ​निधन के बाद उनकी धमक कम हो गई, हांलाकि वे 2008 तक सक्रिय राजनीति में रहे। इसके बाद एक दशक से ज्यादा वक्त से वे कभी कभार पार्टी के बड़े कार्यक्रमों में ही दिखते थे।

महादेवी वर्मा की कविता पर टिप्पणी के बाद पहाड़िया को सीएम पद से हटाया था

1980 में पहाड़िया केवल 13 महीने मुख्यमंत्री रहे थे। उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने का किस्सा भी काफी रोचक है। जयपुर में लेखकों के एक सम्मेलन में सीएम के तौर पर पहाड़िया को बुलाया गया था। उस कार्यक्रम में छायावाद की कविताओं के लिए मशहूर कवयित्री महादेवी वर्मा भी मौजूद थीं। पहाड़िया ने महादेवी वर्मा की कविताओं के बारे में कहा था कि महादेवी वर्मा की कविताएं मेरे कभी समझ नहीं आईं कि वे क्या कहना चाहती हैं। उनकी कविताएं आम लोगों के सिर के ऊपर से निकल जाती हैं, मुझे भी कुछ समझ में नहीं आतीं। साहित्य आम आदमी को समझ आए ऐसा होना चाहिए। बताया जाता है कि पहाड़िया की इस टिप्पणी के बारे में महादेवी वर्मा ने इंदिरा गांधी से शिकायत की थी और उसके बाद पहाड़िया को सीएम पद छोड़ना पड़ा था। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महादेवी वर्मा की कविताओं पर टिप्पणी तो बहाना बना, हटाने का असली कारण उनका विरोध था, उनके पैरोकार संजय गांधी भी नहीं रहे थे।

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