आदिवासी समाज और साप्ताहिक हाट | New India Times

पंकज शर्मा, ब्यूरो चीफ धार (मप्र), NIT:

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हाट-“सप्ताह के किसी निश्चित दिन निश्चित शहर या गांव में, उस क्षैत्र में रहने वाले लोगों कि रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मुलभूत सामग्री क्रय-विक्रय करने हेतु एक बाजार लगाया जाता है,उसे क्षेत्रिय बोली में हाट कहते हैं।”

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अशिक्षित होने के कारण हमारे पुरखा साप्ताहिक वार से अवगत नहीं थे ये लोग अपने क्षैत्र में लगने वाले साप्ताहिक हाट के माध्यम से ही एक हाट अर्थात एक सप्ताह पुरा हुआ समझते थे।

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साप्ताहिक हाट शहर के नाम पर ही पहले प्रचलन में था, जैसे अलिराजपुर को राजपुरिया हाट, नानपुर को नानपुरिया हाट, बोरझाड़ को बुरझाडि़यू हाट इत्यादि। आज भी बड़े बुजुर्ग साप्ताहिक वार नहीं हाट के माध्यम से ही एक हाट पुरा हुआ समझते हैं‌ हमारे पुरखों के समय साधनों का भी अभाव था जिसके कारण हमारे पुर्वज पैदल या बैलगाड़ी के माध्यम से ही सैकड़ों किलोमीटर हाट करने जाते थे और आज भी कुछ लोग पैदल ही हाट करने जाते हैं। लोग अपने क्षैत्र के आस-पास जो भी हाट लगता है जिस क्षेत्र से जो हाट पास पड़ता है उस क्षेत्र के लोग वहां हाट करने जाते है। मध्यप्रदेश (भीलप्रदेश) झाबुआ, अलिराजपुर, धार, बड़वानी आदि जिलों में तीन हाट लगते हैं। (1) तिहवारिया हाट
(2) भगोरिया हाट
(3) उजाडिया हाट
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कलम से: आदिवासी बेटी Dipteshwari Guthare (गांव देहदला,जोबट-जिला अलिराजपुर) मध्य प्रदेश.

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