अरशद रज़ा, NIT;
पर्यावरण दो शब्दों परि तथा आवरण (परि+आवरण) के संयोग से बना है। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर तथा ‘आवरण’ का अर्थ है परिवेश। दूसरे शब्दों में कहें तो पर्यावरण में सभी सजीव (जैविक) व निर्जीव (अजैविक) वस्तुऐं आती हैं। उदाहरण के लिये वायु ,जल ,भूमि ,पेड़-पौधे , जीव-जन्तु ,मानव और उसकी विविध गतिविधियों के परिणाम आदि सभी पर्यावरण के कारक हैं।
धरती की सभी सजीव (जीव-जन्तु) व निर्जीव वस्तुएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा यह एक-दूसरे को प्रभावित करतीं हैं। इसलिए प्रकृति की इन सभी सजीव व निर्जीव वस्तुओं के बीच संतुलन बनाये रखना बहुत ज़रूरी है।
मनुष्य की जीवन शैली में परिवर्तन, औद्योगिक विकास और भौतिक समृद्धि पर्यावरण के संतुलन को तहस−नहस करते जा रहे हैं। पर्यावरण असंतुलन से धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। जिसका प्रभाव समस्त पदार्थो,जीव जन्तुओं, वनस्पतियों व ऋतु चक्र पर पढ़ रहा है। बहुत से जीव-जन्तु व वनस्पतियों की दुर्लभ प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। पर्यावरण असंतुलन के ही कारण कही बाढ़ तो कही सूखा पढ़ रहा है। अगर जल्द ही हम पर्यावरण के प्रति सचेत नहीं हुये तो एक दिन ऐसा भी होगा जब चारों ओर विनाश ही विनाश होगा।
प्रदूषणों के लिए जिम्मेदार हम स्वंय और हमारी नीयत रही है। नीति की बातें तो सभी करते हैं पर व्यवहार में कोई भी नहीं लाता।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाक के लिये सरकारे सचेत रही हैं, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है। इसके लिये केवल सरकारों को ही दोषी नही माना जा सकता है। इसके दोषी विश्वविद्यालयों तथा बड़े−बड़े इंटरनेशनल एनजीओ भी हैं जो करोड़ों के प्रोजेक्ट ले लेते हैं लेकिन कार्य कुछ भी नहीं करते। पर्यावरण संरक्षण के लिये जरूरत है कि सभी लोग चाहे वो सरकार हो, स्वंय सेवी संस्थाऐं या हम स्वंय हो, सभी साथ−साथ आयें और पूरी ज़िम्मेदारी व ईमानदारी से कार्य करें।
सरकार जितने भी नियम-क़ानून लागू करे लेकिन उसके साथ साथ जनता की जागरूकता और सहभागिता से ही पर्यावरण की रक्षा संभव है।

अगर आप सही मायने मे पर्यावरण को बचाना चाहते है तो जीवन में दृढ़तापूर्वक निम्न बातें अपनानी होंगी:-
1. पौधा रोपण कार्यक्रम युद्ध स्तर पर समान रूप से सभी जगह चलाना चाहिए ,चाहे वह परती भूमि हो, पहाड़ी क्षेत्र हो, या फिर ढलान क्षेत्र हो। हर व्यक्ति प्रति वर्ष शुभ अवसरों पर अपने घर, सड़कों के किनारे, सार्वजनिक स्थलों, शिक्षण संस्थानों व कार्यालयों आदि में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाये। शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारीगण राष्ट्रीय पर्वो तथा महत्त्वपूर्ण तिथियों पर पौधे ज़रूर लगायें।
2. जल को गन्दा न करें तथा उसे व्यर्थ न बहायें।
3. बिजली की खपत कम से कम करें तथा अनावश्यक बिजली की बत्ती जलती न छोडें।
4. रास्ते में कूड़ा-कचरा ना डालें। जैसे आप अपने घर की स्वच्छता करते हैं, वैसे ही बाहर रास्ते की भी सफाई रखें।
5. कूड़ा कचरा एक निश्चित जगह पर फेंके। बची सब्जी, छिलके, अवशेष, सड़-गली चीजों को एक जगह एकत्र करके वानस्पतिक खाद तैयार कर सकते हैं।
6. जहां तक संभव हो हम ऐसी वस्तु का प्रयोग न करें, जिसके परिणामस्वरूप जीव-जंतु नष्ट हो जाएं एवं अनेक रोगाणु पनप जाएं।
7. डिस्पोजल, ग्लास, नैपकिन, रेजर आदि का उपयोग दुबारा किया जाना चाहिए।
8. पॉलीथिन का बहिष्कार करें। दुकानदारों से पाॅलिथीन पैकिंग में सामान न लें। आस-पास के लोगों को पाॅलिथीन से उत्पन्न खतरों को बतायें।
