अशफाक कायमखानी, जयपुर, NIT;
भारत का इतिहास देखा जाये तो संघर्ष में पूरी तरह तप कर आजादी आंदोलन से काफी नेता निकले जिन्होंने गुलामी से छुटकारा दिलाकर देश को आजाद करवा कर हमें आजाद भारत सौंप कर गये। दूसरी तरफ कभी कभार कुछ वो नेता भी निकलते हैं जिन्हें मिडिया उभार कर लाता है, वही कुछ नेता वो होते हैं जो अचानक किसी मूवमेंट को लेकर उभर कर अचानक बुलंदिया छूने लगते हैं।हालांकि कांग्रेस-भाजपा में 50-60 साल के नेताओं को भी युवा नेता के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत में जंतर मंतर पर हुये धरने प्रदर्शनों से मिडिया के बल पर अरविंद केजरीवाल नेता के तौर पर उभर कर मुख्यमंत्री तक बन गये हैं। उसी तरह अचानक जवाहर लाल नेहरु विश्वविधालय के एक हादसे को लेकर कन्हेया व शैला रशीद उभरे और वो अब संघर्ष में तप कर नेता बनने की कतार में हैं। इसी तरह गुजरात में पटेल आरक्षण आंदोलन को लेकर हार्दिक पटेल विभिन्न तरह की तकलीफों को सहन करके उभर कर तप रहे हैं, तो वहीं गुजरात में मरे जानवर की चमड़ी निकालने को लेकर दलितों की हत्या को लेकर किये आंदोलन से जिनेश दलित नेता के तौर पर उभर कर मूवमेंट में तप कर नेता की दौड़ मे शामिल हो चुका है। इसी तरह इसी हफ्ते यूपी के सहारणपुर कस्बे के शब्बीर पुर गांव में ठाकूर–दलित टकराव के बाद अचानक भीम सैना के चन्द्रशेखर आजाद दलित नेता के तौर पर यूपी में तेजी के साथ उभरे हैं।
बीस से छच्चीस साल के मध्य की उम्र के आला तालिम याफ्ता व संघर्ष को जीवन में उतारने का प्रण लेने वाले हार्दिक, जिनेश, कन्हेया, शैला व चन्द्रशेखर आजाद वो युवा नेता हैं जिनको उनके विचारों के चलते भारत के प्रभावशाली मिडिया में से ज्यादातर मिडिया तो कभी उभारना ही नहीं चाहता है, लेकिन विदेशी चैनल व अखबार, सोशल मिडिया के विभिन्न रुप उन्हें बार बार उभारने में सहयोग करते नजर आते हैं। यह पांचों युवा नेता मुद्दों की पहचान व जनता की नब्ज टटोलने की कला के माहिर होने के कारण हर समय किसी ना किसी रुप में संघर्ष में तपते आ रहे हैं।
कुल मिलाकर यह है कि “आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है ” वाले कांसेप्ट की तर्ज पर नये युवा नेताओं का उभरना व “संघर्ष से नेता बनता है तो सत्ता उसे भ्रष्ट करती है” के कांसेप्ट की तर्ज पर पुराने नेताओं की विदाई होने का सिलसिला भी भारत में अब फिर से एक दफा चल पड़ा है। उक्त उभरते पांचों युवा नेताओं के विचार किसी सियासी दल के विचारों से मेल खाते है या नहीं लेकिन पांचों का संघर्ष केवल एक राह पर है जो अन्याय के खिलाफ संघर्ष है। दूसरी तरफ आज भी अनेक सियासी दल अपने 50-60 की उम्र वाले नेताओं को युवा नेता कहकर सम्बोधित करने व मुद्दाविहिन सियासत करने के साथ जज्बाती सियासत करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
