संविधान बचाव समिती ने CAA-NRC के विरोध में दिया धरना, NPR पर जागरूकता का अभाव क्यों? | New India Times

नरेंद्र इंगले, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:संविधान बचाव समिती ने CAA-NRC के विरोध में दिया धरना, NPR पर जागरूकता का अभाव क्यों? | New India Times

दुनिया में हमारा भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था और वाकयी हमारे देश मे इतना बेशुमार धन था कि ओरंगजेब बादशाह को दौलताबाद किले पर रखी पुंजी गिनने के लिए 6 हजार मजदूरों को रखना पड़ा था। अंग्रेजों की नजर हमारे भारत की पुंजी पर थी इसलिए उन्होंने यहां के कौमी भाईचारे को बिगाड़ने की कोशिश की और अपना राज कायम किया। आज का भारत विविधता में एकता के साथ मजबूती से उभरा है। इस एकता को कोई ताकत तोड़ नहीं सकती चाहे CAA हो या NRC, ऐसा प्रतिपादन मौलाना इमरान साहब ने किया है। वह जामनेर में संविधान बचाओ समिती की ओर से आयोजित धरना प्रदर्शन में जनता को संबोधीत कर रहे थे। इस धरने में कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, संभाजी ब्रिगेड समेत परिवर्तनवादी संगठनों के पदाधिकारियों ने शिरकत की। कई वक्ताओं ने CAA और NRC पर अपनी बात रखने की नाकाफी कोशिश भी की। राष्ट्रवादी कांग्रेस की ओर से डॉ ऐश्वरी राठोड़, राजेन्द्र पाटिल, कांग्रेस के शंकर राजपुत, संभाजी ब्रिगेड के प्रदीप गायके, समाजसेवी वी पी पाटिल सर तथा अन्य मान्यवरों ने मार्गदर्शन किया।

विदित हो कि CAA और NRC को लेकर जहां पूरे भारत में चल रहे विरोध प्रदर्शनों की प्रेरणा बनकर उभरे JNU, AMU, जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी समेत अन्य शिक्षा संस्थानों के आंदोलनों को भारी जनाधार प्राप्त हो रहा है लेकिन उस तर्ज पर इसके विपरीत ग्रामीण इलाकों में हो रहे प्रोटेस्ट जनता में CAA और NRC को लेकर जागरूकता फैलाने में कुछ खास असरदार नजर नहीं आ रहे हैं। CAA-NRC के ड्राफ्ट तक शायद नेताओ, वक्ताओं के पास उपलब्ध नहीं है। CAA , NRC को लेकर न्यूज चैनलों पर चलने वाली बहस ही ग्रामीण इलाकों के प्रोटेस्ट में भाषणो का खाका तय्यार करती दिखाई पड़ रही है। अब जामनेर के इस आंदोलन में जहां मानवता के पैरोकार के रूप में मौलाना इमरान साहब ने अपना जो वक्तव्य रखा वह बिल्कुल ठीक है लेकिन अन्य नेताओं ने CAA, NRC के विषय से संलग्न NPR के बारे मे लोगों को जागरूक करने के बजाय सरकार की आलोचना करना ही सही समझा। National population register राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीकरण ( NPR) CAA , NRC की बुनियादी संरचना है जिसे केंद्र सरकार ने फ्रेम कर दिया है और उसका काम जुलाई 2020 से आरंभ हो जाएगा। NPR को लेकर नए और पुराने नियमों पर शायद कुछ पेंच फंस सकता है। आने वाले दिनों मे CAA, NRC की संवैधानिक वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ी जानी है जिसके निर्णय की सभी को प्रतीक्षा रहेगी। वहीं NPR को लेकर भी कई मांगे उठेंगी जिसमें जातिगत जनगणना अहम संवैधानिक मांग होगी जो प्रत्येक नागरिक के हक और अधिकारो की सुरक्षा के लिए होनी भी चाहिए। ग्रामीण इलाकों में चल रहे CAA, NRC विरोधी आंदोलनों में NPR के तथ्यों को लेकर जनता के बीच जानकारी साझा होना बेहद जरूरी है। बुद्धिजीवी नागरिक होने के नाते समाज में एक तबका ऐसा भी है जो NPR के बिंदु पर आंदोलनों की कयादत करने वाले तत्वों से इस उम्मीद के साथ अपनी साफ सुथरी राय रखता है की वह जुलाई 2020 से होने जा रहे NPR के बारे में सही जानकारी को सरल स्थानीय भाषा में रखे ना की अंग्रेजी के भारी भरकम लाइनों में ताकी आम लोगों को NPR के उद्देश्य का लाभ इसलिए हो सकेगा क्योंकि उसमें जातिगत डेटा जमा किए जाने की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। कहीं ऐसा न हो कि CAA, NRC के डर से लोग NPR से कन्नी काट लें। रही बात CAA, NRC की तो इन चीज़ों की न्यायिक समीक्षा होनी है जो देश की शीर्ष अदालत करेगी। इस दौरान CAA, NRC का विरोध प्रदर्शन करना तो वो भारत के हर नागरिक का संवैधानिक हक है हि उसे कोई ताकत छीन नहीं सकती।

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