संदीप तिवारी, ब्यूरो चीफ, पन्ना (मप्र), NIT:

गत लगभग दो दशक में संपूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम और निर्मल भारत अभियान के तहत कुछ प्रयास हुए थे, जो नाकाफी रहे। कारण? इनमें राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति एवं जनभागीदारी की महत्वपूर्ण कमियां थीं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को लाल किले की प्राचीर से दिए गए अपने पहले भाषण में स्वच्छता को देश के एक व्यापक एजेंडे के रूप में देश के सामने रखा। उन्होंने स्वच्छता के महत्व को कुछ इस तरह बयां किया था- ‘पहले शौचालय, फिर देवालय।’ इस भावना को अमली जामा पहनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) की शुरुआत की गई।
इस मिशन ने मानो ठहरे हुए पानी में कंकड़ मार दिए हैं। जन-जन में साफ-सफाई की आदत को बढ़ावा देने और खुले में शौच जाने की प्रथा को समाप्त करने का संदेश देने के लिए प्रधानमंत्री के साथ लाखों लोगों ने अपने हाथ में झाड़ू थामी।
कई जगह लड़कियों ने ससुराल में जाने से पहले शौचालय बनाने की मांग रखना शुरू कर दिया। कई जगह लोगों ने प्रोत्साहन राशि न मिलने पर भी स्वेच्छा से अपने घर में शौचालय बनवा लिए। वातावरण की साफ-सफाई के अन्य प्रयास भी देश में शुरू हुए हैं।
मप्र के हरदा में ही चलाए गए मल युद्ध अभियान द्वारा की जा रही पहल का स्वयं प्रधानमंत्री ने रेडियो पर प्रसारित अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उल्लेख किया है। देश-दुनिया में चर्चा हो रही है कि स्वच्छता कार्यक्रम ने सही मायने में अभियान का रूप ले लिया है।इसके पीछे यह मन जाग रहा है कि स्वच्छता मिशन के साथ अब व्यापक राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सक्रियता और जनभागीदारी दिखने लगी है। केंद्र सरकार ने 2019 तक भारत को खुले में शौचमुक्त बनाने के लिए योजना भी कार्ययोजना बना ली है।यहां तक तो ठीक है, पर यक्षप्रश्न ये है कि क्या सिर्फ प्रधानमंत्री की इच्छा और कार्ययोजना बना लेने मात्र से देश में क्या स्वच्छता का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है? असल बात करे धरातल जमीनी आगामी सालो साल में इस लक्ष्य को हासिल करना यानी पहाड़ तोड़ने जैसा कठिन और चुनौतीपूर्ण है।यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मिशन में ‘दसरथ माझियों’ का तो अता-पता ही नहीं है। इस तथ्य को समझने के लिए मप्र के स्वच्छता से जुड़े कुछ जरूरी आंकड़ों, राज्य में 1 साल में प्राप्त उपलब्धियों और चल रही प्रक्रियाओं पर रोशनी डालना जरूरी है। बिगत 1 साल में भाबरा (आलीराजपुर), बड़वानी, सरदारपुर (धार) और पेटलावद (झाबुआ) जिलों की 62 पंचायतों के 125 से अधिक गांवों में स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर हुए प्रयासों को करीब से देखने के बाद जमीनी हकीकत कुछ और ही दिखी जो स्वक्ष भारत के मायने में खरी नहीं रही वही बात करे पन्ना आमानगंज कि तो स्वच्छता और स्वक्ष के भारत मिशन पर जिम्म्मे दारी के चलते गाड़ी बाला आया घर से कचड़ा निकाल की आवाज देती हुई कचड़ा गाड़ी तो निकलती है लेकिन जरा गौर फर माये जनाब कचड़े फेकने बाले कूड़ा दानों के हालत बद से बदत्तर हो गए है स्वक्ष भारत सम्रद्धि भारत लिखी दीबालो के सामने लगा कचड़ा मुह चिढ़ा रहा है हा हमे डर है इस बात का कहि ऐसा लिखने से हमे या आपको जेल न जाना पड़ जाये क्यो की एम पी में नमक रोटी भरी बच्चो की थाली के खाने का सच दिखाने में भी सरकारें बदनाम हो जाती है नगर की जमीनी सच्चाई-की बात करें तो नगर के साप्ताहिक मंगल बाजार में बना शोचालय अभी चालू नही हो पाया है साथ ही *नगर परिषद आमानगंज के बाजू से बना सुलभ शोचालय जिसमे शाम 5 बजे से ताला लग जाता है* और बात करें सफाई की तो हर जगह लाल गुटके की पीक और बदबू से गनगना रहे है क्यो की नगर में बने *पुरुष महिला मूत्रालयों में नेलपोलिन की गोलियां नही डाली जाती है* स्वक्ष भारत मे कागजो में अपने जिले पन्ना को पछाड़ अब्बल चलने बाले अमानगंज की ही नगर परिषद के बाजू में एक नजर जरा डालकर देखे तो पता चलेगा की गंदगी से अछूता नगर अमानगंज परिषद परिषर भी नही है आप देख सकते है जनरेटर के बगल में टूटी पड़ी स्वक्ष भारत की कचड़ा दान बाल्टियां झाड़ू पानी पीने बाले मटके और तो और बरसात में बाढ़ आने पर रेस्क्यू करने बाली नाव में लार्वा पीपा बजबजा रहे है जिनसे डेंगू जैसी घातक बीमारियां जनित होती है मजे की बात एक ओर है कि नगर में शौचालय के मल को साफ करने वाली रखी मशीन बिना उपयोग किए ही कबाड़ हो रही है। उस मशीन पर चढ़ी हरी भरी पत्तों की बेल मानो नगर की लचर व्यवस्था को बयां कर रही है साथ ही एक बात और से एक महाशय जो नगर परिषद की तरफ से सफाई की निगरानी में टू बिलर से घूमते रहते क्या उनको कभी ये चीजें नही दिखाई देती हम तो पूछगे आखिर कब तक चलेगा कागजो में अब्वल चल रहे स्वक्षता परिणाम का कार्यनामा जवकि हकीकत कुछ और कह रही है?
