नरेंद्र इंगले, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:
27 अप्रैल की शाम सोनाला गांव से पता चलता है कि किसी किसान द्वारा जहर घोलकर रखे गए पानी के पीने से मारे गए मोर, काला हीरण और बंदरों की लाशें वहीं खेत के बाँध पर दफ़नायी गयी है। जानकारी के आधार पर वनविभाग का उड़न दस्ता मौके पर पहुंचकर रहस्य को उजागर करने के लिए रात के अंधेरे में सर्च अभियान चलाता है, दूसरे दिन यह खबर अखबारों की सुर्खियां बन जाती है और पत्रकारीता जगत में सनसनी सी मच जाती है। इसी सनसनी के चक्कर मे लाइव्ह अपडेट न्यूज कवरेज को लेकर चौंकाने वाले शीर्षकों के साथ सोशल मीडिया में यह पूरा मामला खास अंदाज में फ्रेम किया जाता है लेकिन पड़ताल के बाद सामने आया सच परीस्थिति के विपरीत होता है। बहरहाल इस पूरे मामले की सच्चाई जानने के लिए संवाददाता द्वारा पहुर बीट के जंगलों मेइ स्थित घटना स्थल का जायजा लिया गया, जहां मामला बिल्कूल साफ सुथरा नजर आया। मौके पर वनविभाग अपने तामझाम समेत जानवरों की खोजी हुई लाशों के साथ डाॅक्टरी परामर्श की प्रतिक्षा में तत्पर था। कड़ी धूप, मुख्य फ़ोरलेन का निर्माणधिन काम और जंगल की संकरी पगडंडियां इन सब असुविधाओं के चलते कुछ विलंब से पहुंचे पशुधन अधिकारी डाॅ श्री एस एच व्यवहार, डाॅ श्रीमती एस एस मनगुडे की निगरानी में यह बात साफ़ हो गयी कि जमीन से निकाले गए अवशेष बंदरों के हैं। सरकारी जंगलों के बीचोबीच कुछेक निजी खेत हैं। गुट नं 555 में मालकियत रखने वाले और पशु हत्या के कथित आरोपों से संदेह से घिरे सोनाला निवासी 70 वर्ष के किसान श्री लक्ष्मण रामदास पाटील ने बताया कि मुझ पर पशु हत्या के लगाए गए सभी आरोप राजनिती तथा व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरीत हैं। कुछ दिनों पहले तीन बंदर और उनका एक बच्चा मुझे खेत में मरे पडे़ दिखाई दिए थे, शायद उन्हें लू लग गयी होगा, मेरे और सहयोगियों के अनुरोध स्वरुप परिपेक्ष में कार्यरत जेसीबी मशीन चालक ने इन मृत बंदरों का अंतिम संस्कार कराने के लिए एक गड्ढा खोद दिया जिसमें सभी बंदरों को दफ़नाया गया। मैं अनपढ़ आदमी हूँ, कानून नहीं जानता, मानवता तथा हिंदू धर्म संस्कृति के मान्यताओं के अनुसार मैंने मृत बंदरों का सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। पानी के अभाव से मेरा खेत खाली पडा है, भला मैं पानी में जहर मिलाकर जानवरों को क्यों और किस लिए मार सकता हूं? फिर भी अगर मैंने कुछ गलत किया है और इसके लिए मुझे सूली पर चढ़ा दिया तो भी मुझे कोई शिकवा नहीं है।
वन अधिकारी श्री समाधान पाटील ने बताया कि जमीन कि खुदाई में हमें कुल चार बंदरों के गले हुए शव बरामद हुए हैं, मोर, काला हीरण वगैरह जैसे पशु पक्षियों का अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। बंदरों की मौत किस कारण हुयी इसका पता लगाने के लिए पशु वैद्यकिय अधिकारियों द्वारा जांचे गए मानकों के रिपोर्ट पर ही आगे कि कार्रवाई की जाएगी।
बहरहाल उक्त मामले की समीक्षा से बुद्धिजिवी निजी तौर पर यह खेद जरुर व्यक्त कर सकते हैं कि पत्रकारिता कितने अजीब मंजर पर आ धमकी है कि किसी खबर के दावे की सत्यता को बिना जांचे ब्रेकिंग वाले गेटअप में सजाकर पाठकों तक पहुंचाने के चक्कर में खबर ही किस तरह बेखबरी का शिकार होती है और अंत में शेष रहता है केवल ब्रेकिंग जिससे ब्रेक यानी गतिरोध ही पैदा होता है।
