लेखक: मो. तारिक़
भोपाल (मप्र), NIT;
गैर संविधानिक अनुमती आदेश से अधिकतर होते दंगे-फसाद, जो प्रायोजित नहीं बल्कि प्रशासनिक होते हैं ! प्रशासन रीढ़ की हड्डी, आदेश पारित हुये न्यायालयों से न अब हो चक्का जाम, फिर भी बाधित होता यातायात, फैलता प्रदूषण, बढ़ता क्षेत्र का तापमान! हम तो नाचेंगे गायेंगे मंच लगायेंगे फिर मचायेंगे सड़क पर ही हुडदंग चाहे चले जाए गंभीर रोगी के प्राण!
धार्मिक तीज त्योहारों में अब अनुमती महत्व नहीं रखती, बस तिरंगा हो उस जुलूस में साथ। संविधान का अपमान, एकता अखंडता को दूषित करते अग्यानी धर्म अनुयाई साथ ही असमाजिक प्रवृत्ति साथ निकलते हथियारों के जैसे लड़ने जा रहें हों धर्म के नाम लड़ाई, दूसरे धर्म अनुयाई रिहाइशी इलाकों से जुलूस निकाल जब तक आंख दिखा शक्ती प्रदर्शन न कर लें एक दुसरे के धार्मिक स्थल के सामने नाच-गाना न कर लें तो मन को शांति और संतुष्टि जब ही स्वीकार करेगी ! लेखक एक राष्ट्रवादी रुप में यह कहने से भी न चुकेगा कि जिन्हें प्रशासनिक कार्य का अनुभव नहीं वो बाबु स्तर के लोग बने बैठें हैं अधिकारी, कलेक्टर, पुलिस अधिक्षक, अनुविभगिया अधिकारी जिन्हें संविधान सहित नियम व शर्तों का पालन नही सहित मा न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों से अंभिगता से घटित हो जाते हैं दंगे फसाद !
शांती और मानवाधिकार संरक्षण हेतू गठित अंतर्राष्ट्रिय सहित संयुक्त राष्ट्र संघ से सम्बंधता प्राप्त संस्था के नेशनल पीआरओ व एमपी स्टेट प्रेसीडेंट मो. तारिक़ दुआरा बतलाया कि विश्व में सबसे अधिक चिंतनियां मामले हैं तो वो हैं ग्लोबल वार्मिंग जिससे जल-वायू में विष फैलता जा रहा है और शासन प्रशासन का ढुल मुल रवैया से सड़क मार्ग पर होने वाले राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक आयोजनों पर न्यायालयों के निर्देशों की अवहेलना कोई नई बात नहीं। अब यदि आयोजन स्थल पर भीड अनियंत्रित हो जाये और दंगा-फसाद हो तो उसकी ज़िम्मेदारी किसी अधिकारी की नही !
पर्यावरण को बचाने उसे संतुलित बनाये रखने तथा विश्व को प्रदूषण के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए मनुष्य द्वारा यह कृत्य करने से रोकने के लिए चिंतित समाजसेवियों द्वारा समय समय पर रैलियां, पोस्टर-पम्पलेट, विरोध प्रदर्शन, याचिकाओं के माध्यम से भारतिया संविधान के अनुसार मा न्यायालयों के पारित आदेश सहित एनजीटी में सम्मिलित जो नियम अभी दो पांच या दस साल पुराने नहीं बल्कि तीस चालीस वर्ष पुराने नियम जिन सबको जोड़ एक अधिकरण बना दिया गया और बहुत तेज़ी से प्रकृती की संरचना में बाधित हो रहे समस्त मामलों पर सुनवाई कर शासन तथा प्रशासन को सख्त हिदायात दी जाती हैं तथा अधिकरण के निर्देशों का पालन उपरांत अधिकरण को सूचित करने का प्रावधान हैं !
पीस इंडिया एमपी प्रेसीडेंट ने आगे बताया कि हमारा देश जो संस्कृति सभ्यता का देश हुआ करता था, गंगा-जमुनी संस्कृती परंतु अब तीज त्यौहारों की आमद अव्यवस्था, अराजकता, उन्माद फैलने की आशंका बने या जगह जगह भारी पुलिस बल दिखें तो यह खुशियों का त्यौहार नहीं प्रशासन-पुलिस सेना की सुरक्षा में हीं मनेगें अब त्यौहार क्योंकी त्यौहार तो धार्मिक लेकिन अब सात दशक बीतने पर हमको मिली जो स्वतंत्रता उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे धार्मिक मान्यतायें तभी पूरी जब हों धर्म का सही प्रचार-प्रसार !
“हां जी हां अब हमारे त्यौहारों की खुशियां तो तभी पूरी होंगी जब तक चौक-चौराहों पर किसका बड़ा पंडाल, सड़क मार्ग बाधित कर धीमी गति से चले यातायात यह चक्का जाम यह सब अपराध नहीं देश हमारा जो हो चुका आज़ाद ! यह धीमी गति के यातायात या चक्का जाम से अभिप्राय यह नहीं की रास्ता रोक कर मार्ग अवरुद्ध कर दिया अपितु जुलूस या रैली सबसे अधिक मार्गों को न सिर्फ बाधित कर जनजीवन अस्त-व्यस्त करती है बल्कि कई थाना क्षेत्रों से होकर गुजरने वाले इन आयोजनों से हर क्षेत्र के चिकित्सालय, जीवन रक्षक एंबुलेंस, बीमार और लाचार वृद्ध हो चुके वरिष्ठजन, हताश-निराश स्कूल बसों में बैठे विद्यार्थी और उनकी प्रतीक्षा में राह तक रहे अभिभावक, बालिकाएं-महिलाएं, एवं “नाना प्रकार की जटिल समस्याओं से जूझता स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार” ! नगर बंद जैसी स्थिति तथा धीमी रफ्तार का यातायात ! उसी से ईश्वर से अधिक तो वो धार्मिक संघटन व उनके नेता पदाधिकारी होंगे अब प्रसन्न जबकी इस बाधित चक्काजाम जैसी संकीर्ण जटिल सम्सस्या से नागरिकों को निजात दिलाने मा न्यायालयों द्वारा कई बार किये पारित आदेश !”*
पीस इंडिया नेशनल पीआरओ व एमपी प्रेसीडेंट मो. तारिक़ ने दिया था ज़िला प्रशासन भोपाल को एक नहीं दो ज्ञापन जो संविधानुसार पूरे देश में लागू नियम हमारे प्रदेश की राजधानी में लागू क्यों नहीं जिसमें :-
“सर्व प्रथम हाई मियूज़ीकल सिस्टम (डीजे) में लगे वो सिस्टम को प्रतिबंधित करा जाये जिससे प्रदूषण फैलता है साथ न्यायालय सहित एनजीटी का भी हवाला दिया, इस सम्बंध में ज़िला कलेटर कार्यालय से समस्त अनुविभागिय अधिकारीयों को निर्देश भी जारी हुये समाचार पत्रों में भी प्रकाशन हुआ कि अब तेज़ आवाज़ वाले जिनसे ध्वनी प्रदूषण फैलता है वो प्रतिबंधित फिर भी दे धना धन बज रहा ज़िला प्रशासन मौन ! जबकी ज़िला प्रशासन के निर्देश पर जानने पीस इंडिया ने लगाई आरटीआई कितने प्रकरण बनें कितना जुर्माना तो एक अनुविभागिय अधिकारी से जवाब मिला शिकायत दर्ज करने पर होगी कार्यवाहीं ! दूसरा ज्ञापन सड़क यातायात बाधित न हो, सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक आयोजनों से चौक-चौराहों, मार्गों को मुक्त रखा जाये परंतू असक्षम ज़िला प्रशासन या यूं कहा जाये न्यायालय की अवमानना कोई नई बात नहीं या किसी दबाओं में सात तालों में संदूक या अलमारी में बंद पड़ी हो न्यायालयों के आदेश की प्रतियां ! अपने ही अपने देश में नागरिक नागरिकता के स्वतंत्रता अधिकार से जूझता ! सात दशक बीत गए, आखिर तुम जागोगे कब यार !”*
पीस इंडिया नेशनल पीआरओ व प्रदेश अध्यक्ष मो. तारिक़ ने कहां कि जिसका धूम-धड़ाका अधिक वो धर्म सच्चा और अनुयाई ईश्वर की नज़र में अच्छा बस यहीं हौड़ से देश में रैलियां निकालकर सड़क मार्गों चौक-चौराहों पर मंच लगाकर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन कर अपनी राजनीति को चमकाएं, सूने और खाली हो जाते उपासना स्थल चौक-चौराहों पर अस्थाई निर्माण कर धार्मिक प्रचार करें, कहीं अनुमति तो कहीं बिना अनुमति के हो जाते आयोजन, लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन रीढ़ की हड्डी, न्यायालयों ने दिए आदेश न अब हो चक्का जाम फिर भी आईएएस-आईपीएस न ले संज्ञान, शहरों में खाली पड़े कई स्थान ! धीमी गति से बाधित होता यातायात से फैलता प्रदूषण, बढ़ता जाता है उस क्षेत्र का तापमान !
“शासन-प्रशासन न जाने किस दबाव में सात तालों में संदूक या अलमारी में बंद पड़ी हो न्यायालयों के आदेश की प्रतियां ! अपने ही अपने देश में नागरिक नागरिकता के स्वतंत्रता अधिकार से जूझता ! “सात दशक बीत गए, आखिर तुम जागोगे कब यार !”*
राष्ट्रहित में समस्त राष्ट्रवादीयों, समाजसेवियों सहित सामाजिक संघटनों, पत्रकार, लेखक, पर्यावरण प्रेमियों से विनम्र आग्रह इस लेख को कापी/पेस्ट की पूरी खुली छूट ! मेरी आवाज़ को अपनी जनहित की आवाज़ बनायें !
“”अब तो फिर वैचारिक द्वंद हैं !”
मो. तारिक़ (स्वतंत्र लेखक)
