मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

उलेमा ही उम्मत के असल रहबर और क़ाइद हैं, उलेमा और आवाम दोनों अपनी ज़िम्मेदारी समझें : जलगांव के धार्मिक विद्वान एवं ओजस्वी वक्ता मुफ़्ती मोहम्मद हारून नदवी | New India Times

ऐतिहासिक और पौराणिक नगरी बुरहानपुर में मुस्लिम समाज जनों को धार्मिक और सामाजिक पहचान को नई ऊर्जा देने वाला एक अज़ीमुश्शान धर्म सभा (जलसा-ए-आम) का आयोजन गत दिवस मंडी बाज़ार, इक़बाल चौक स्थित मस्जिद नवाब अब्दुल रहीम में नमाज़-ए-ईशा किया गया। इस रूहानी और इल्मी महफ़िल में देश की दो प्रतिष्ठित धार्मिक शख़्सियतों, मशहूर आलिम-ए-दीन क़ारी रशीद अहमद साहब अजमेरी और बेबाक विचारों के लिए पहचाने जाने वाले मुफ़्ती मोहम्मद हारून साहब नदवी जलगांव महाराष्ट्र को विशेष अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम का आग़ाज़ पवित्र क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत और बारगाह-ए-रिसालत में नात-ए-पाक के नज़राने से हुआ। इसके बाद दोनों विद्वानों के विचारों ने उपस्थित मुस्लिम समाज जनों को दीन, समाज और उम्मत के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों पर गंभीरता से सोचने का संदेश दिया।

जलसे को संबोधित करते हुए देश के मशहूर, बेबाक आलिम-ए-दीन, सियासी एवं सामाजिक रहनुमा और नौजवानों में विशेष लोकप्रियता रखने वाले हज़रत मुफ्ती मोहम्मद हारून नदवी ने ‘मुल्क के मौजूदा हालात में मुसलमानों की ज़िम्मेदारी’ विषय पर अपने प्रभावशाली ख़िताब में कहा कि मौजूदा परिस्थितियां निश्चित रूप से चिंताजनक हैं। मॉब लिंचिंग, मस्जिदों और मदरसों को निशाना बनाए जाने, शरीअत में दख़ल अंदाज़ी और समाज में नफ़रत का ज़हर घोलने जैसी घटनाएं देश की सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे के लिए गंभीर चुनौती हैं। लेकिन इन हालात में भी अल्लाह की रहमत से कभी मायूस नहीं होना चाहिए। मुश्किलें चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों। ईमान, हौसले और सही दिशा में किए गए प्रयासों से उसका सामना किया जा सकता है।

ओजस्वी वक्ता मुफ़्ती हारून नदवी ने उलेमा की भूमिका को बेहद अहम बताते हुए कहा कि यह समय केवल हालात पर चिंता जताने का नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देने और उसका हौसला बढ़ाने का है। उलेमा की ज़िम्मेदारी है कि वे आवाम को सब्र, अमन, शांति और आपसी एकता के साथ चुनौतियों का सामना करना सिखाएं। नफ़रत की आग को बुझाने के लिए मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत की बारिश ज़रूरी है। नफ़रत का मुक़ाबला नफ़रत से नहीं, बल्कि मोहब्बत, अच्छे अख़लाक़(नैतिकता)और सकारात्मक सोच से किया जा सकता है।

उन्होंने अपने ख़िताब (संबोधन)में एक महत्वपूर्ण बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन उलेमा की रहनुमाई और मार्गदर्शन समाज के लिए हमेशा ज़रूरी है। उलेमा ही उम्मत के असल लीडर, क़ाइद और रहबर हैं। उलेमा और आवाम, दोनों को इस हक़ीक़त को समझना होगा। उलेमा की ज़िम्मेदारी महज़ मस्जिदों में नमाज़ पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम समाज जनों को ज़िंदगी के हर मोड़ पर उसकी रहनुमाई करना, उसे सही और ग़लत का फ़र्क़ समझाना तथा मुश्किल हालात में हौसला और सही रास्ता दिखाना भी उलेमाओं की अहम ज़िम्मेदारी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इंशाअल्लाह हालात बदलेंगे और मोहब्बत, अमन तथा एकता की फ़िज़ा फिर मज़बूत होगी।

इसके बाद हज़रत क़ारी रशीद अहमद साहब अजमेरी ने अपने नसीहत-आमेज़ ख़िताब में बेहद सादगी और प्रभावशाली अंदाज़ में एक बड़ी बात समझाई। उन्होंने कहा कि हम अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मानने का दावा तो करते हैं, लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि उनके बताए हुए रास्ते और एहकामात पर अमल करना भी शुरू करें। जिस दिन हम अल्लाह और उसके रसूल SAW की सच्चे दिल से आज्ञाकारी करने लगेंगे, इंशाअल्लाह हमारी ज़िंदगी के बहुत से मसले ख़ुद-ब-ख़ुद आसान होने लगेंगे।

उन्होंने नमाज़ की पाबंदी, क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत, ज़िक्र-ए-इलाही और अच्छे कर्म (कर्म) को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की ताकीद की। साथ ही कहा कि इंसान को अपने अख़लाक़ और व्यवहार को बेहतर बनाना चाहिए, क्योंकि अच्छा चरित्र ही किसी व्यक्ति की असल पहचान है। जब हमारा आचरण अच्छा होगा और हमारे व्यवहार में मोहब्बत, नरमी तथा इंसानियत होगी, तो दुनिया भी हमारे क़रीब आएगी और हमारे किरदार की क़ायल होगी।

इस अज़ीमुश्शान धार्मिक आयोजन में शहर के प्रतिष्ठित उलेमा और धार्मिक हस्तियों में मुफ्ती रहमतुल्लाह क़ासमी, डॉ. हाफ़िज़ मौलाना सलीम नदवी गिन्नौरी, मुफ्ती अंसार अहमद क़ासमी, मौलाना अतीक अहमद इशाअती, मौलाना शाकिर, हाफ़िज़ अब्दुल हकीम, मौलाना नईम फैज़ी, मौलाना इक़बाल क़ासमी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

आख़िर में हज़रत क़ारी रशीद अहमद साहब अजमेरी की ख़ुसूसी दुआ के साथ जलसे का समापन हुआ। पूरे आयोजन में दीन की बुनियादी शिक्षाओं पर अमल, उलेमा की रहनुमाई, मुस्लिम समाज जन(उम्मत)की एकजुटता, आपसी भाईचारे और समाज में अमन व मोहब्बत क़ायम रखने का संदेश प्रमुखता से उभरकर सामने आया। यह जलसा केवल एक धार्मिक तक़रीर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अपने किरदार को संवारने, अपनी ज़िम्मेदारियों को पहचानने और समाज को बेहतर बनाने की सामूहिक प्रेरणा देकर संपन्न हुआ।

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