Edited by Sabir Khan, NIT:

लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे

विश्व पोलियो दिवस प्रत्येक वर्ष 24 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पोलियोमाइलाइटिस के प्रति जागरूकता बढ़ाना, टीकाकरण के महत्व को रेखांकित करना और पोलियो उन्मूलन के वैश्विक प्रयासों को गति देना है। भारत ने पोलियो उन्मूलन की दिशा में ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। देश में जंगली पोलियोवायरस का अंतिम मामला जनवरी 2011 में सामने आया था और विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को मार्च 2014 में पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया। फिर भी, किसी क्षेत्र का पोलियो-मुक्त प्रमाणन पूरी दुनिया से पोलियो के उन्मूलन के समान नहीं है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जंगली पोलियोवायरस का बना रहना, कुछ देशों में वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस का प्रसार तथा टीकाकरण और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच इस चुनौती को जटिल बनाते हैं। यह लेख पोलियो के वैज्ञानिक आधार, भारत की उपलब्धियों, वैश्विक स्थिति, निगरानी व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रश्नों का विश्लेषण करता है। इसका केंद्रीय तर्क है कि पोलियो उन्मूलन केवल टीके उपलब्ध कराने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, वैज्ञानिक विश्वास, सामाजिक भागीदारी और समान अवसर सुनिश्चित करने का सतत दायित्व है।

मुख्य शब्द: विश्व पोलियो दिवस, पोलियो उन्मूलन, टीकाकरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जंगली पोलियोवायरस, वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस, स्वास्थ्य समानता।

1\. प्रस्तावना

पोलियो एक संक्रामक बीमारी है, जो मुख्यतः छोटे बच्चों को प्रभावित करती है। इसका कारण पोलियोवायरस है। संक्रमण के अनेक मामलों में स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते, लेकिन कुछ मामलों में यह तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करके स्थायी पक्षाघात का कारण बन सकता है। गंभीर स्थिति में श्वसन संबंधी मांसपेशियाँ प्रभावित होने पर जीवन का संकट भी पैदा हो सकता है। पोलियो से होने वाली विकलांगता का असर केवल संक्रमित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता; परिवार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।

विश्व पोलियो दिवस का महत्व इसी व्यापक संदर्भ में है। यह दिन वैज्ञानिक उपलब्धियों को याद करने के साथ-साथ उन क्षेत्रों और समुदायों पर ध्यान देने का अवसर देता है, जहाँ संक्रमण का खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ है। टीकों ने पोलियो के मामलों में भारी कमी की है, लेकिन जब तक दुनिया में कहीं भी वायरस का प्रसार जारी है, दूसरे क्षेत्रों में भी उसके पुनः प्रवेश की आशंका बनी रहती है।

पोलियो उन्मूलन की चर्चा में दो अतियों से बचना आवश्यक है। पहली, भारत की उपलब्धि को कम करके आँकना; दूसरी, क्षेत्रीय सफलता को वैश्विक समस्या का पूर्ण समाधान मान लेना। वैज्ञानिक और नीतिगत दृष्टि से सही दृष्टिकोण यह है कि उपलब्धियों को स्वीकार किया जाए, शेष जोखिमों की पहचान की जाए और प्रमाण-आधारित उपायों को निरंतर मजबूत किया जाए।

2\. पोलियो क्या है और यह कैसे फैलता है?

पोलियोमाइलाइटिस, जिसे सामान्यतः पोलियो कहा जाता है, पोलियोवायरस से होने वाला संक्रामक रोग है। इसका प्रसार मुख्यतः मल-मुख मार्ग से होता है। दूषित पानी, भोजन, हाथों और अस्वच्छ परिस्थितियों के माध्यम से वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँच सकता है। स्वच्छता की कमी और सुरक्षित पानी की अनुपलब्धता संक्रमण के प्रसार को बढ़ा सकती है।

संक्रमण होने पर हर व्यक्ति में पक्षाघात विकसित नहीं होता। कई संक्रमित लोगों में लक्षण नहीं दिखाई देते या सामान्य बीमारी जैसे लक्षण होते हैं। यही कारण है कि केवल दिखाई देने वाले रोगियों के आधार पर वायरस के प्रसार का अनुमान लगाना पर्याप्त नहीं है। संक्रमित व्यक्ति में स्पष्ट लक्षण न होने पर भी वायरस समुदाय में फैल सकता है।

पोलियो का सबसे गंभीर परिणाम तीव्र शिथिल पक्षाघात हो सकता है। इसमें अंगों की मांसपेशियों की शक्ति अचानक कम हो जाती है। ऐसे लक्षणों की समय पर चिकित्सकीय जाँच और सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को सूचना देना महत्त्वपूर्ण है। बीमारी का कोई विशिष्ट उपचार वायरस को समाप्त नहीं करता; इसलिए संक्रमण रोकने का सबसे प्रभावी उपाय टीकाकरण है।

3\. विश्व पोलियो दिवस का उद्देश्य

24 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व पोलियो दिवस पोलियो उन्मूलन के लिए जागरूकता, संसाधन और राजनीतिक प्रतिबद्धता बढ़ाने का अवसर है। यह तारीख पोलियो टीके के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जोनास साल्क के जन्मदिन से जुड़ी है।

इस दिवस के प्रमुख उद्देश्य हैं—पोलियो टीकाकरण के प्रति विश्वास और भागीदारी बढ़ाना, छूटे हुए बच्चों तक पहुँच सुनिश्चित करना, स्वास्थ्यकर्मियों के योगदान को पहचानना, संक्रमण की निगरानी मजबूत करना और उन समुदायों तक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाना जो भौगोलिक, आर्थिक या सामाजिक कारणों से पीछे रह जाते हैं।

इस दिवस को केवल औपचारिक समारोह तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसका वास्तविक महत्व तभी है जब जागरूकता का परिणाम नियमित टीकाकरण, बेहतर निगरानी, सुरक्षित पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच के रूप में दिखाई दे।

4\. भारत की पोलियो उन्मूलन यात्रा: संघर्ष से ऐतिहासिक सफलता तक

भारत में पोलियो उन्मूलन की सफलता व्यापक टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की सक्रिय भागीदारी, निगरानी व्यवस्था और समुदायों तक पहुँच बनाने के लंबे प्रयासों का परिणाम है। वर्ष 1994 में दिल्ली से शुरू हुए पल्स पोलियो कार्यक्रम ने बाद में राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप लिया। घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो की खुराक देना, टीकाकरण केंद्र स्थापित करना, यात्रा मार्गों और संवेदनशील क्षेत्रों में बच्चों तक पहुँचना तथा जन-जागरूकता अभियान चलाना इस रणनीति के महत्त्वपूर्ण हिस्से रहे।

भारत में जंगली पोलियोवायरस का अंतिम दर्ज मामला 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में सामने आया था। इसके बाद देश में जंगली पोलियोवायरस का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। 27 मार्च 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया। यह उपलब्धि भारत सहित क्षेत्र के देशों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी।

इस सफलता को केवल टीके की उपलब्धता के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भारत जैसे विशाल और सामाजिक-आर्थिक रूप से विविध देश में प्रत्येक बच्चे तक पहुँचना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती थी। प्रवासी परिवारों, झुग्गी-बस्तियों, दूरस्थ क्षेत्रों और नियमित स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित समुदायों तक पहुँचने के लिए विशेष रणनीतियाँ अपनानी पड़ीं। स्वास्थ्यकर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं, स्थानीय नेतृत्व और सामुदायिक स्वयंसेवकों की भूमिका ने कार्यक्रम को जनभागीदारी से जोड़ा।

भारत का अनुभव यह भी बताता है कि जनस्वास्थ्य की सफलता के लिए वैज्ञानिक उपायों के साथ सामाजिक विश्वास जरूरी है। यदि परिवार टीकाकरण के महत्व को नहीं समझते या स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा नहीं करते, तो केवल वैक्सीन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होता। इसलिए संवाद, स्थानीय भाषा में जानकारी और समुदायों की चिंताओं को समझना उन्मूलन रणनीति के आवश्यक हिस्से हैं।

5\. पोलियो-मुक्त प्रमाणन और वैश्विक उन्मूलन में अंतर

पोलियो पर चर्चा करते समय तीन अवधारणाओं के बीच अंतर समझना आवश्यक है—किसी देश में जंगली वायरस का प्रसार रुकना, किसी क्षेत्र का पोलियो-मुक्त प्रमाणित होना और पूरी दुनिया से वायरस का उन्मूलन होना।

भारत की उपलब्धि और विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र का प्रमाणन इस बात का प्रमाण है कि वहाँ स्वदेशी जंगली पोलियोवायरस का प्रसार बाधित हुआ। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया के सभी देशों से पोलियोवायरस समाप्त हो चुका है। जब तक वायरस किसी अन्य स्थान पर प्रसारित हो रहा है, अंतरराष्ट्रीय यात्रा और जनसंख्या की आवाजाही के माध्यम से उसके दूसरे क्षेत्रों तक पहुँचने की आशंका बनी रहती है।

इसलिए भारत को पोलियो-मुक्त प्रमाणन मिलने के बाद भी टीकाकरण, रोग निगरानी और प्रयोगशाला जाँच जारी रखना आवश्यक है। प्रमाणन किसी अभियान का अंतिम विराम नहीं, बल्कि उपलब्धि को सुरक्षित बनाए रखने की जिम्मेदारी है।

6\. वैश्विक स्थिति: पोलियो उन्मूलन अभी अधूरा क्यों है?

विश्व स्तर पर पोलियो के मामलों में भारी कमी आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 1988 से पोलियो के मामलों में 99 प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की गई है। फिर भी, जंगली पोलियोवायरस का प्रसार समाप्त नहीं हुआ है।

25 अगस्त 2026 को प्रकाशित विश्व स्वास्थ्य संगठन की पोलियो आपातकालीन समिति की रिपोर्ट ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जंगली पोलियोवायरस के निरंतर प्रसार पर चिंता व्यक्त की। रिपोर्ट में 2026 में 30 अप्रैल तक 12 देशों में सर्कुलेटिंग वैक्सीन-डिराइव्ड पोलियोवायरस के 32 मामले और पर्यावरणीय नमूनों में 27 सकारात्मक पहचान दर्ज की गई थीं। ये आँकड़े एक निश्चित समयावधि तक के हैं, इसलिए इन्हें पूरे वर्ष के अंतिम आँकड़े नहीं माना जाना चाहिए।

इस स्थिति से स्पष्ट है कि पोलियो उन्मूलन की चुनौती अब केवल अधिक संख्या में टीके लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें कमजोर स्वास्थ्य प्रणालियों, सीमापार संक्रमण, छूटे हुए बच्चों, संघर्षग्रस्त क्षेत्रों और नियमित निगरानी की कमी जैसी समस्याएँ भी शामिल हैं।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान में संक्रमण का बने रहना भारत सहित आसपास के देशों के लिए भी सतर्कता का कारण है। हालांकि, जोखिम की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं है कि भारत में जंगली पोलियोवायरस का प्रसार फिर शुरू हो गया है। इसका अर्थ है कि देश को निगरानी और टीकाकरण में लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

7\. वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस: वैज्ञानिक तथ्य और भ्रम

पोलियो उन्मूलन के संदर्भ में वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस का उल्लेख अक्सर भ्रम पैदा करता है। इसे समझने के लिए मौखिक पोलियो वैक्सीन और निष्क्रिय पोलियो वैक्सीन के बीच अंतर जानना उपयोगी है।

मौखिक पोलियो वैक्सीन (OPV) में कमजोर किए गए जीवित वायरस का उपयोग किया जाता है। यह आंतों में प्रतिरक्षा विकसित करने और वायरस के प्रसार को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अत्यंत कम टीकाकरण वाले समुदायों में कमजोर वायरस लंबे समय तक प्रसारित होते हुए आनुवंशिक परिवर्तन कर सकता है और दुर्लभ परिस्थितियों में वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियोवायरस का रूप ले सकता है। जब ऐसा वायरस समुदाय में लगातार फैलता है और संक्रमण पैदा करता है, तो उसे सर्कुलेटिंग वैक्सीन-डिराइव्ड पोलियोवायरस (cVDPV) कहा जाता है।

यह स्थिति अपर्याप्त टीकाकरण और कम सामुदायिक प्रतिरक्षा से जुड़ी होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पोलियो टीकाकरण छोड़ देना चाहिए। इसके विपरीत, पर्याप्त और समान टीकाकरण कवरेज ऐसी परिस्थितियों की संभावना को कम करने का मुख्य उपाय है।

निष्क्रिय पोलियो वैक्सीन (IPV) में निष्क्रिय वायरस का उपयोग होता है। यह पोलियो से सुरक्षा प्रदान करती है और नियमित टीकाकरण कार्यक्रम का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। कौन-सी वैक्सीन, कितनी खुराकों में और किस आयु पर दी जानी चाहिए, इसका निर्धारण राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाना चाहिए।

इस विषय पर सार्वजनिक संवाद में दो बातों को स्पष्ट रखना आवश्यक है। पहली, पोलियो टीकाकरण ने वैश्विक स्तर पर बीमारी के मामलों में भारी कमी लाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। दूसरी, वैक्सीन-व्युत्पन्न वायरस की चुनौती को नकारने के बजाय वैज्ञानिक निगरानी और उच्च टीकाकरण कवरेज से उसका समाधान करना चाहिए।

8\. टीकाकरण के साथ निगरानी क्यों आवश्यक है?

पोलियो उन्मूलन केवल टीकाकरण अभियान की सफलता से सुनिश्चित नहीं होता। वायरस के संभावित प्रसार की पहचान करने के लिए संवेदनशील और विश्वसनीय निगरानी व्यवस्था भी आवश्यक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की Global Polio Surveillance Action Plan 2025–2026 में निगरानी के पाँच प्रमुख कार्यक्षेत्र बताए गए हैं। इनमें बच्चों में तीव्र शिथिल पक्षाघात के मामलों की निगरानी, सीवेज और अपशिष्ट जल में वायरस की जाँच, कुछ प्रतिरक्षा-अल्पता वाले रोगियों में वैक्सीन-व्युत्पन्न वायरस की निगरानी, प्रयोगशाला परीक्षण और आनुवंशिक अनुक्रमण तथा केंद्रीय सूचना प्रबंधन शामिल हैं।

इन उपायों का महत्त्व अलग-अलग है:-

* तीव्र शिथिल पक्षाघात की निगरानी: बच्चों में अचानक मांसपेशीय कमजोरी या पक्षाघात जैसे लक्षणों की जाँच और रिपोर्टिंग से संभावित संक्रमण की पहचान हो सकती है।

* पर्यावरणीय निगरानी: सीवेज और अपशिष्ट जल के नमूनों में वायरस की पहचान से ऐसे क्षेत्रों का संकेत मिल सकता है जहाँ संक्रमण मौजूद हो, भले ही कोई स्पष्ट रोगी सामने न आया हो।

* प्रयोगशाला जाँच और आनुवंशिक अनुक्रमण: वायरस की पहचान, उसके प्रकार और संभावित प्रसार-मार्गों को समझने में सहायता मिलती है।

* डेटा प्रबंधन: विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त सूचनाओं को व्यवस्थित रूप से एकत्रित और विश्लेषित करके समय पर कार्रवाई की जा सकती है।

भारत के लिए इन प्रणालियों को मजबूत बनाए रखना विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी, व्यापक आंतरिक आवाजाही और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों के कारण किसी संभावित खतरे की पहचान में देरी नहीं होनी चाहिए।

9\. सामाजिक असमानता और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच

पोलियो उन्मूलन का प्रश्न केवल चिकित्सा विज्ञान का प्रश्न नहीं है; यह सामाजिक न्याय से भी जुड़ा है। जिन परिवारों के पास सुरक्षित आवास, स्वच्छ पानी, नियमित स्वास्थ्य सेवाएँ और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध है, उनके लिए टीकाकरण तक पहुँचना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसके विपरीत, प्रवासी मजदूरों, अस्थायी बस्तियों में रहने वाले परिवारों, दूरस्थ क्षेत्रों के निवासियों और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित समुदायों के बच्चों के छूट जाने की आशंका अधिक हो सकती है।

ऐसी परिस्थितियों में जिम्मेदारी केवल परिवारों पर डालना उचित नहीं होगा। स्वास्थ्य व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि टीकाकरण सेवाएँ लोगों के लिए सुलभ हों, समय और स्थान की बाधाएँ कम हों तथा पात्र बच्चों को निर्धारित खुराकें मिल सकें।

सामुदायिक संवाद का उद्देश्य लोगों को दोष देना नहीं, बल्कि उनकी शंकाओं को सुनना और विश्वसनीय वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना होना चाहिए। स्थानीय संस्थाओं, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और समुदाय के विश्वसनीय व्यक्तियों की भागीदारी से यह कार्य अधिक प्रभावी हो सकता है।

स्वास्थ्य समानता का वास्तविक अर्थ है कि किसी बच्चे की सुरक्षा उसके परिवार की आय, निवास स्थान, सामाजिक स्थिति या जानकारी तक पहुँच पर निर्भर न रहे। पोलियो उन्मूलन की स्थायी सफलता तभी संभव है जब टीकाकरण की पहुँच सबसे वंचित बच्चों तक सुनिश्चित हो।

10\. जनभागीदारी और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका

पोलियो उन्मूलन जैसे कार्यक्रमों में सरकार और स्वास्थ्य विभाग की केंद्रीय भूमिका होती है, लेकिन सामाजिक संस्थाएँ समुदाय और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच संवाद का माध्यम बन सकती हैं। वे स्थानीय स्तर पर जागरूकता, सही जानकारी के प्रसार, परिवारों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने के लिए प्रेरित करने और गलत सूचनाओं के समाधान में सहयोग कर सकती हैं।

गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के शिक्षा, बाल-अधिकार और सामुदायिक जागरूकता से जुड़े कार्यों के व्यापक संदर्भ में सार्वजनिक स्वास्थ्य की जानकारी का प्रसार भी सामाजिक सहभागिता का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसी गतिविधियों में संस्था की भूमिका स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक निर्देशों के अनुरूप, तथ्य-आधारित जानकारी देने और समुदायों को उपलब्ध सेवाओं से जोड़ने तक स्पष्ट रूप से निर्धारित की जानी चाहिए।

सामाजिक संस्थाओं को चिकित्सा संबंधी दावे स्वयं निर्धारित करने के बजाय विश्वसनीय स्रोतों पर निर्भर रहना चाहिए। टीकाकरण से जुड़े प्रश्नों, संभावित दुष्प्रभावों और बच्चों की व्यक्तिगत स्वास्थ्य परिस्थितियों पर योग्य स्वास्थ्यकर्मियों की सलाह को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

11\. लेखक के पूर्व प्रकाशित कार्यों से संबंधित संदर्भ

लेखक के उपलब्ध प्रकाशित कार्यों में बाल-अधिकार, स्कूल स्तर पर जागरूकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े कुछ प्रसंग मिलते हैं। उदाहरण के लिए, New India Times में 2019 में प्रकाशित “शासकीय एमएलबी स्कूल में बालिकाओं के अधिकार को लेकर स्कूल फोरम का हुआ गठन” शीर्षक की रिपोर्ट शिक्षा संस्थान में बच्चों के अधिकारों और जागरूकता से संबंधित पहल का संदर्भ देती है। [New India Times में प्रकाशित रिपोर्ट देखें](https://www.newindiatimes.net/?p=39860&utm_source=chatgpt.com)।

इसी तरह, 2021 में GKSSS की ओर से कोविड-19 टीकाकरण को लेकर गलत सूचनाओं के संबंध में मुख्य चिकित्सा अधिकारी से संवाद की रिपोर्ट भी सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता के संदर्भ में प्रासंगिक है। [टीकाकरण संबंधी संवाद की रिपोर्ट देखें](https://www.newindiatimes.net/?p=75051&utm_source=chatgpt.com)।

इन लेखों और रिपोर्टों का उल्लेख सीमित उद्देश्य से किया गया है। इन्हें पोलियो पर लेखक के प्रत्यक्ष शोध या पोलियो उन्मूलन संबंधी स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इनका संबंध व्यापक रूप से बाल-अधिकार, जन-जागरूकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य संवाद से है। उपलब्ध सामग्री के आधार पर लेखक का कोई प्रत्यक्ष पोलियो-केंद्रित शोध लेख सत्यापित नहीं हुआ है।

12\. पोलियो उन्मूलन के लिए प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताएँ

पोलियो उन्मूलन को अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाने और भारत की उपलब्धि सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित प्राथमिकताओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

पहली, नियमित टीकाकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। विशेष अभियान उपयोगी हैं, लेकिन वे नियमित टीकाकरण का विकल्प नहीं हैं। प्रत्येक पात्र बच्चे को राष्ट्रीय कार्यक्रम के अनुसार निर्धारित खुराकें मिलनी चाहिए।

दूसरी, छूटे हुए बच्चों की पहचान की जाए। प्रवासी परिवारों, दूरस्थ बस्तियों और स्वास्थ्य सेवाओं से कम जुड़ाव वाले समुदायों तक पहुँचने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट योजनाएँ बनाई जाएँ।

तीसरी, निगरानी और प्रयोगशाला क्षमता मजबूत रखी जाए। किसी संभावित संक्रमण की समय पर पहचान के लिए मानव और पर्यावरणीय निगरानी के बीच समन्वय आवश्यक है।

चौथी, सीमापार सहयोग को प्रभावी बनाया जाए। वायरस राष्ट्रीय सीमाओं का पालन नहीं करता। इसलिए प्रभावित देशों और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाओं के बीच सूचना साझा करना, निगरानी और टीकाकरण संबंधी सहयोग आवश्यक है।

पाँचवीं, गलत सूचनाओं का जवाब वैज्ञानिक संवाद से दिया जाए। लोगों की चिंताओं को अनसुना करने के बजाय सरल भाषा में विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

छठी, कार्यक्रमों के परिणामों का पारदर्शी मूल्यांकन किया जाए। केवल वितरित खुराकों की संख्या पर्याप्त संकेतक नहीं है। छूटे हुए बच्चों, टीकाकरण कवरेज, निगरानी की गुणवत्ता और संभावित संक्रमण पर कार्रवाई के समय का भी मूल्यांकन होना चाहिए।

सातवीं, स्वास्थ्य सेवाओं में समानता सुनिश्चित की जाए। आर्थिक, भौगोलिक और सामाजिक बाधाओं के कारण कोई बच्चा टीकाकरण से वंचित न रहे—इसे कार्यक्रम की सफलता का केंद्रीय मानदंड बनाया जाना चाहिए।

13\. पोलियो उन्मूलन के व्यापक सामाजिक अर्थ

पोलियो उन्मूलन की उपलब्धि हमें यह समझने का अवसर देती है कि विज्ञान, सार्वजनिक नीति और सामाजिक भागीदारी मिलकर किस प्रकार बड़ी स्वास्थ्य चुनौती का समाधान कर सकते हैं। लेकिन इस सफलता को स्थायी बनाए रखने के लिए निरंतर संसाधन, भरोसेमंद संस्थाएँ और उत्तरदायी प्रशासन आवश्यक हैं।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पोलियो उन्मूलन और स्वास्थ्य समानता परस्पर जुड़े हुए हैं। यदि किसी क्षेत्र में बच्चों को नियमित टीकाकरण नहीं मिल रहा, स्वच्छ पानी की कमी है या स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर हैं, तो केवल एक बीमारी के विरुद्ध अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करना भी दीर्घकालिक सुरक्षा का हिस्सा है।

भारत का अनुभव दूसरे देशों के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन हर देश की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। किसी रणनीति की सफलता के लिए स्थानीय स्वास्थ्य प्रणाली, समुदाय की आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप उसका कार्यान्वयन जरूरी है।

14\. निष्कर्ष

विश्व पोलियो दिवस हमें भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि का स्मरण कराता है, लेकिन साथ ही यह भी बताता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य में सफलता को बनाए रखना निरंतर प्रयास माँगता है। भारत में जंगली पोलियोवायरस का अंतिम मामला जनवरी 2011 में दर्ज हुआ और मार्च 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया। यह व्यापक टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत, वैज्ञानिक निगरानी और सामुदायिक भागीदारी की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

फिर भी, वैश्विक स्तर पर जंगली पोलियोवायरस और वैक्सीन-व्युत्पन्न वायरस की चुनौती बनी हुई है। इसलिए किसी देश या क्षेत्र का पोलियो-मुक्त होना पूरी दुनिया से पोलियो के उन्मूलन के समान नहीं है। नियमित टीकाकरण, पर्यावरणीय और चिकित्सकीय निगरानी, प्रयोगशाला क्षमता, सीमापार सहयोग और समुदायों का विश्वास इस दिशा में अनिवार्य हैं।

पोलियो उन्मूलन का वास्तविक अर्थ केवल बीमारी के मामलों में कमी नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित जीवन का समान अवसर देना है। यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब वैज्ञानिक प्रमाणों को सार्वजनिक नीति में स्थान मिले, स्वास्थ्य सेवाएँ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचें और कोई बच्चा सामाजिक या आर्थिक वंचना के कारण टीकाकरण से छूटने न पाए।

संदेश स्पष्ट है: भारत की पोलियो-मुक्त उपलब्धि को सुरक्षित रखना और दुनिया को पोलियो-मुक्त बनाना साझा वैज्ञानिक, सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारी है।

संदर्भ सूची

* World Health Organization (WHO). Poliomyelitis (Polio): Questions and Answers, 8 April 2025. [WHO का आधिकारिक विवरण](https://www.who.int/news-room/questions-and-answers/item/poliomyelitis?utm_source=chatgpt.com)।

* World Health Organization (WHO). Statement of the Forty-fifth Meeting of the Polio IHR Emergency Committee, 25 August 2026. [वैश्विक पोलियो स्थिति पर समिति का वक्तव्य](https://www.who.int/news/item/25-08-2026-statement-of-the-forty-fifth-meeting-of-the-polio-ihr-emergency-committee?utm_source=chatgpt.com)।

* World Health Organization (WHO). Global Polio Surveillance Action Plan 2025–2026. [वैश्विक पोलियो निगरानी कार्ययोजना](https://www.who.int/publications/b/76243?utm_source=chatgpt.com)।

* Press Information Bureau, Government of India. Eradication of Polio, 10 August 2018. [भारत की पोलियो-मुक्त स्थिति और निगरानी संबंधी विवरण](https://www.pib.gov.in/Pressreleaseshare.aspx?PRID=1542730&lang=2&reg=48&utm_source=chatgpt.com)।

* World Health Organization, India. A push to vaccinate every child, everywhere, ended polio in India, 7 April 2021. [भारत में पोलियो उन्मूलन की रणनीति](https://www.who.int/india/news-room/feature-stories/detail/a-push-to-vaccinate-every-child-everywhere-ended-polio-in-india?utm_source=chatgpt.com)।

* Bahl, S. et al. Polio-Free Certification and Lessons Learned—South-East Asia Region, March 2014. MMWR, 2014. [दक्षिण-पूर्व एशिया के पोलियो-मुक्त प्रमाणन पर शोध लेख](https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC5779468/?utm_source=chatgpt.com)।


* New India Times. “शासकीय एमएलबी स्कूल में बालिकाओं के अधिकार को लेकर स्कूल फोरम का हुआ गठन,” 2019. [लेखक से संबंधित बाल-अधिकार रिपोर्ट](https://www.newindiatimes.net/?p=39860&utm_source=chatgpt.com)।

* New India Times. GKSSS और कोविड-19 टीकाकरण संबंधी गलत सूचनाओं पर संवाद की रिपोर्ट, 2021. [लेखक से संबंधित सार्वजनिक स्वास्थ्य रिपोर्ट](https://www.newindiatimes.net/?p=75051&utm_source=chatgpt.com)।

लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS)।

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