Edited by Sabir Khan, NIT:
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
भारत की पहचान केवल उसकी संवैधानिक संस्थाओं से नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही उसकी सांस्कृतिक, दार्शनिक और धार्मिक परंपराओं से भी निर्मित हुई है। इसलिए धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के संबंध पर विमर्श स्वाभाविक होने के साथ-साथ संवेदनशील विषय भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा धर्म और राष्ट्र के संबंध में व्यक्त विचारों को भी केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया के आधार पर नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक, दार्शनिक और संवैधानिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।
भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित नहीं रहा है। धर्म को कर्तव्य, नैतिक आचरण, न्याय, सत्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण से भी जोड़ा गया है। यदि सार्वजनिक विमर्श में धर्म का प्रयोग इसी व्यापक अर्थ में किया जाता है, तो उसे सीधे किसी एक धार्मिक समुदाय की राजनीतिक पहचान के रूप में देखना उचित नहीं होगा। हालांकि, इसके साथ यह स्पष्ट रहना भी जरूरी है कि आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य की वैधानिक पहचान संविधान से निर्धारित होती है।
संविधान है शासन की सर्वोच्च आधारशिला
भारतीय लोकतंत्र में संविधान शासन की सर्वोच्च विधिक आधारशिला है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सहित राज्य की सभी संस्थाओं की शक्तियां संविधान से निर्धारित होती हैं। नागरिकों के मौलिक अधिकार और राज्य की सीमाएं भी संविधान द्वारा तय की गई हैं।
संविधान की प्रस्तावना भारत को ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ घोषित करती है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता को राष्ट्र-जीवन के मूल आदर्शों के रूप में स्थापित करती है। इसलिए भारतीय सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हुए यह अंतर बनाए रखना आवश्यक है कि सांस्कृतिक पहचान और राज्य की संवैधानिक पहचान एक ही विषय नहीं हैं।
भारत की सांस्कृतिक पहचान बहुआयामी है, जबकि राज्य की वैधानिक पहचान संविधान से निर्धारित होती है।
पंथनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध नहीं
भारतीय पंथनिरपेक्षता का अर्थ धर्म या धार्मिक आस्था का विरोध करना नहीं है। इसका मूल अर्थ यह है कि राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करे और किसी व्यक्ति की संवैधानिक स्थिति उसके धर्म के आधार पर निर्धारित न हो।
भारत में प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था रखने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता है। धार्मिक संस्थाओं को भी संविधान संरक्षण देता है, लेकिन भारत किसी एक धर्म का राज्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में पंथनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया है।
इसलिए धर्म का सम्मान और पंथनिरपेक्ष राज्य—दोनों एक साथ संभव हैं। वास्तव में भारतीय संविधान इसी संतुलन की व्यवस्था करता है।
समान नागरिकता ही राष्ट्रीय एकता की ताकत
संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है।
भारत में नागरिक अलग-अलग धार्मिक परंपराओं से जुड़े हो सकते हैं या किसी धार्मिक आस्था का पालन न करने वाले भी हो सकते हैं, लेकिन उनकी नागरिकता और मौलिक अधिकार समान हैं। यही समान नागरिकता भारतीय राष्ट्र की संवैधानिक शक्ति है।
राष्ट्रीय एकता का अर्थ धार्मिक एकरूपता नहीं, बल्कि विभिन्न धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक पहचान वाले नागरिकों की समान संवैधानिक स्थिति है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संवैधानिक मर्यादा
धर्म, राष्ट्र और संस्कृति जैसे विषयों पर विचार व्यक्त करना लोकतांत्रिक अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, हालांकि अनुच्छेद 19(2) के तहत संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार और नैतिकता आदि से जुड़े आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
इसलिए किसी विचार से असहमति व्यक्त करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन केवल वैचारिक मतभेद के आधार पर किसी व्यक्ति या संगठन को अवैध घोषित करना उचित नहीं होगा। यदि कोई वक्तव्य या गतिविधि कानून का उल्लंघन करती है तो सक्षम संस्थाओं को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करनी चाहिए।
धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा सुरक्षित
अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक और परोपकारी मामलों के प्रबंधन से जुड़े अधिकार प्रदान करता है।
हालांकि ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन किसी धार्मिक संस्था को संविधान से ऊपर कोई वैधानिक सत्ता प्रदान नहीं करता।
इसी प्रकार अनुच्छेद 27 और 28 राज्य और धर्म के संबंध में संवैधानिक संतुलन स्थापित करते हैं, जबकि अनुच्छेद 29 और 30 भारत की भाषायी, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के संरक्षण से जुड़े अधिकारों की व्यवस्था करते हैं।
संस्कृति की रक्षा का अर्थ धार्मिक एकरूपता नहीं
अनुच्छेद 51-क नागरिकों में धार्मिक, भाषायी और क्षेत्रीय विविधताओं से परे समरसता और बंधुत्व की भावना विकसित करने का दायित्व बताता है। इसी के तहत भारत की समन्वित संस्कृति की समृद्ध विरासत को सुरक्षित रखने तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और सुधार की भावना विकसित करने पर भी जोर दिया गया है।
इसलिए भारतीय संस्कृति की रक्षा का संवैधानिक अर्थ किसी एक धार्मिक पहचान को राष्ट्र की एकमात्र पहचान बना देना नहीं है। इसका अर्थ भारत की बहुलतापूर्ण और समन्वित सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है।
धर्म और राष्ट्र के अर्थ में अंतर समझना जरूरी
धर्म व्यक्ति या समुदाय की आस्था, नैतिकता, जीवन-दृष्टि और आध्यात्मिक परंपराओं से संबंधित हो सकता है, जबकि आधुनिक संवैधानिक अर्थ में राष्ट्र नागरिकों, भू-भाग, संस्थाओं, कानून, संप्रभुता और साझा राजनीतिक व्यवस्था से निर्मित होता है।
इसलिए धर्म और राष्ट्र के बीच सांस्कृतिक संबंधों पर विमर्श किया जा सकता है। नैतिकता, कर्तव्य, सत्य, न्याय और लोककल्याण जैसे मूल्य राष्ट्र-जीवन को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन यदि धर्म का अर्थ किसी एक धार्मिक पहचान को राष्ट्र की अनिवार्य राजनीतिक पहचान बनाना हो, तो यह संविधान की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था और समान नागरिकता के सिद्धांत से जुड़ा गंभीर संवैधानिक प्रश्न बन जाता है।
यही अंतर इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
मोहन भागवत के वक्तव्य को संवैधानिक कसौटी पर समझना होगा
मोहन भागवत के हालिया वक्तव्य को पूरी तरह नकारने के बजाय पहले उसके आशय को समझना आवश्यक है। यदि ‘धर्म’ का अर्थ भारतीय परंपरा के अनुसार कर्तव्य, नैतिकता, लोककल्याण और सामाजिक उत्तरदायित्व है, तो इन मूल्यों को लोकतांत्रिक जीवन में सकारात्मक माना जा सकता है। भारतीय संविधान भी न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे मूल्यों को महत्व देता है।
लेकिन यदि धर्म और राष्ट्र के संबंध की व्याख्या इस रूप में की जाती है कि किसी एक धार्मिक पहचान को भारत की संवैधानिक पहचान का अनिवार्य आधार माना जाए, तो उस विचार का संवैधानिक परीक्षण आवश्यक है।
असहमति का अर्थ किसी व्यक्ति या संगठन का विरोध नहीं, बल्कि विचार को संविधान की कसौटी पर परखना होना चाहिए।
संघ के संबंध में भी तथ्यात्मक और संयमित दृष्टिकोण जरूरी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में चर्चा करते समय भाषा तथ्यात्मक, संयमित और कानूनी होनी चाहिए। इतिहास में संघ पर भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था। महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में लगाया गया यह प्रतिबंध 12 जुलाई 1949 को हटा लिया गया था। इसलिए इस ऐतिहासिक तथ्य का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन वर्तमान स्थिति को ‘प्रतिबंधित संगठन’ के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इसी प्रकार किसी संगठन की विचारधारा से असहमति और किसी संगठन को कानूनी रूप से ‘असंवैधानिक’ घोषित करना दो अलग बातें हैं। यदि किसी संगठन की गतिविधियां कानून का उल्लंघन करती हैं तो सक्षम संस्थाएं निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकती हैं। केवल वैचारिक मतभेद के आधार पर प्रतिबंध की मांग करना
संवैधानिक कसौटी नहीं हो सकती।
विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 में किसी संगठन को विधिविरुद्ध घोषित करने और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के प्रावधान हैं। इसलिए किसी संगठन पर प्रतिबंध की मांग प्रमाण, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए, न कि केवल राजनीतिक या भावनात्मक प्रतिक्रिया के आधार पर।
संविधान की कसौटी सभी के लिए समान हो
भारत के लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी में है कि संविधान की कसौटी सभी पर समान रूप से लागू हो। धार्मिक संगठन हो या सामाजिक संगठन, राजनीतिक दल हो या वैचारिक समूह—किसी को भी संविधान से ऊपर नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था का केवल इसलिए अपमान भी नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी विशेष धर्म से संबंधित है।
हमें दो अतियों से बचना होगा—पहली, धर्म को संविधान से ऊपर रखना और दूसरी, धर्म तथा संस्कृति को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह बाहर कर देना। भारतीय संविधान इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करता है।
राष्ट्रीय एकता का आधार समान नागरिकता
भारत की शक्ति धार्मिक या सांस्कृतिक एकरूपता में नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच सह-अस्तित्व की क्षमता में है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, बौद्ध विहार, जैन मंदिर और अन्य धार्मिक संस्थाएं अपनी-अपनी परंपराओं के साथ अस्तित्व में रह सकती हैं। इसी तरह अनेक भाषाएं, संस्कृतियां और जीवन-पद्धतियां भारतीय राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा हैं।
राष्ट्रीय एकता का अर्थ इन विविधताओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि समान नागरिकता के सूत्र में जोड़ना है। भारत की अखंडता का सबसे मजबूत आधार संविधान, कानून का शासन, समान नागरिकता, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता है।
संवैधानिक राष्ट्रवाद ही संतुलित मार्ग
मैं भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करता हूं और मानता हूं कि भारतीय समाज के नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है। साथ ही यह भी मानता हूं कि आधुनिक भारतीय गणराज्य की वैधानिक पहचान संविधान से निर्धारित होती है।
इसलिए धर्म और संस्कृति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन राज्य की नीतियां संविधान के अनुसार चलनी चाहिए। धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता सुरक्षित रहनी चाहिए, लेकिन किसी धर्म को नागरिकों की समान संवैधानिक स्थिति से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
मोहन भागवत के वक्तव्य को लेकर मेरा आग्रह विरोध का नहीं, बल्कि संवैधानिक स्पष्टता का है। यदि ‘धर्म’ का अर्थ नैतिकता, कर्तव्य, सत्य, न्याय और लोककल्याण है तो इन मूल्यों का लोकतांत्रिक जीवन में स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि धर्म को किसी एक धार्मिक पहचान की राजनीतिक सर्वोच्चता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो उसका लोकतांत्रिक और संवैधानिक परीक्षण आवश्यक है।
इसी तरह किसी संगठन या व्यक्ति को केवल वैचारिक असहमति के कारण असंवैधानिक या प्रतिबंधित घोषित करना भी उचित नहीं होगा। कानून का उल्लंघन हो तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो और वैचारिक मतभेद हो तो उसका उत्तर लोकतांत्रिक विमर्श, तर्क और संवैधानिक मूल्यों से दिया जाए।
धर्म का सम्मान हो, आस्था की स्वतंत्रता हो, संस्कृति की रक्षा हो और संविधान की सर्वोच्चता भी अक्षुण्ण रहे—यही भारत की लोकतांत्रिक और बहुलतापूर्ण पहचान का संतुलित मार्ग है।
भारत की शक्ति उसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि उसकी विविधता को समान नागरिकता के सूत्र में बांधने में है। धर्म मानने की स्वतंत्रता सबको है, संस्कृति के संरक्षण का अधिकार सबको है और अपने विचार रखने की स्वतंत्रता भी सबको है, लेकिन संविधान की सर्वोच्चता सभी पर समान रूप से लागू होती है।
यही संवैधानिक राष्ट्रवाद भारत की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक भविष्य की मजबूत आधारशिला है।
लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (जीकेएसएसएस), ग्वालियर।
