मुख्यधारा का स्वर और हाशिए की आवाज़: लता मंगेशकर, डॉ. आंबेडकर और आंबेडकरवादी संगीत-संस्कृति पर शोधपरक दृष्टि | New India Times

Edited by Sabir Khan, NIT:

लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे

भारतीय संगीत इतिहास में लता मंगेशकर का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। सात दशकों से अधिक समय तक उनकी आवाज भारतीय फिल्म संगीत की प्रमुख पहचान बनी रही और उनकी लोकप्रियता देश की सीमाओं से बाहर तक पहुँची। वर्ष 2001 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। हालांकि किसी कलाकार की कलात्मक उपलब्धि और उसके सामाजिक प्रतिनिधित्व को एक ही कसौटी पर देखना उचित नहीं है। इसी अंतर को केंद्र में रखते हुए यह अध्ययन भारतीय लोकप्रिय संगीत की मुख्यधारा में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, जाति-विरोध, दलित आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय से जुड़े विचारों के प्रतिनिधित्व तथा आंबेडकरवादी भीमगीत परंपरा को समझने का प्रयास करता है।

लोकप्रियता और सामाजिक प्रतिनिधित्व अलग-अलग
लता मंगेशकर की व्यापक लोकप्रियता एक ऐतिहासिक तथ्य है। उनके गीतों ने भारतीय सिनेमा के संगीत को देश-विदेश के विशाल श्रोता वर्ग तक पहुँचाया। लेकिन लोकप्रियता का अर्थ यह नहीं है कि किसी कलाकार के गीतों में प्रत्येक सामाजिक समुदाय के संघर्षों और आकांक्षाओं का समान प्रतिनिधित्व भी हो।
यहीं से संगीत की लोकप्रियता और सामाजिक प्रतिनिधित्व के बीच अंतर सामने आता है। किसी कलाकार के गीत करोड़ों लोगों तक पहुँच सकते हैं, लेकिन किसी विशेष सामाजिक संघर्ष को उनमें सीमित स्थान मिल सकता है। 2022 में Contemporary Voice of Dalit में प्रकाशित प्रमोद रंजन के अध्ययन Social and Political Concerns of Lata Mangeshkar: An Ambedkarite Perspective में भी लता मंगेशकर के सामाजिक सरोकारों को आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से देखा गया है। अध्ययन में दलित प्रश्नों से उनकी दूरी को लेकर आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। हालांकि इसे एक अकादमिक अध्ययन का निष्कर्ष मानना चाहिए, सर्वसम्मत ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं।

डॉ. आंबेडकर और सांस्कृतिक आंदोलन
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का संघर्ष केवल संविधान, राजनीति और प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं था। शिक्षा, समानता, आत्मसम्मान, मानव गरिमा और जातिगत भेदभाव के विरोध से जुड़ा उनका आंदोलन आगे चलकर एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन का आधार भी बना।
आंबेडकरवादी समाज ने अपनी वैचारिक और सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए गीत, शाहिरी, जलसा, पोवाड़ा, बुद्धगीत और भीमगीत जैसी विधाओं को माध्यम बनाया। जोएल कैबालियन और जूलियन जुगांद के अध्ययन Bhim Geet and the Ambedkarite Movement: The Genesis of a Cultural Field of Protest में भीमगीत को महाराष्ट्र में विकसित एक विशिष्ट सांस्कृतिक और कलात्मक क्षेत्र के रूप में देखा गया है। इन गीतों में जाति-विरोध, आत्मसम्मान, गरिमा और मुक्ति की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिली।

भीमगीतों ने बनाई अपनी सांस्कृतिक आवाज
आंबेडकरवादी संगीत परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि समुदाय ने अपनी आवाज स्वयं विकसित की। महाराष्ट्र के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गायन मंडलियों तथा सांस्कृतिक समूहों ने आंबेडकर जयंती, बुद्ध जयंती, धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस और महापरिनिर्वाण दिवस जैसे अवसरों पर भीमगीतों को सार्वजनिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
इन गीतों ने मनोरंजन के साथ-साथ सामुदायिक पहचान, शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना को भी स्वर दिया। इस दृष्टि से भीमगीतों को केवल राजनीतिक गीत कहना उनके व्यापक सांस्कृतिक महत्व को सीमित करना होगा।
महाड़ सत्याग्रह, मनुस्मृति दहन, मंदिर प्रवेश आंदोलन, बौद्ध धम्म, समानता और सामाजिक मुक्ति जैसे विषय इन गीतों में सांस्कृतिक स्मृति के रूप में संरक्षित हुए। इस प्रकार भीमगीत वंचित समाज के वैकल्पिक इतिहास और सामूहिक स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम भी बने।

लता मंगेशकर और आंबेडकर गीत का सवाल
इस अध्ययन का संवेदनशील पक्ष लता मंगेशकर और डॉ. आंबेडकर से जुड़े गीतों का प्रश्न है। उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में लता मंगेशकर द्वारा किसी स्थापित प्रसिद्ध आंबेडकरवादी या भीमगीत के गायन का प्रमाण सामने नहीं आता। इसी कारण समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि इतनी प्रभावशाली गायिका ने डॉ. आंबेडकर पर गीत क्यों नहीं गाया।
हालांकि इस विषय में शोधपरक सावधानी आवश्यक है। वर्ष 2019 में डॉ. रविचंद्र हडसणकर के एक सार्वजनिक व्याख्यान के संबंध में प्रकाशित रिपोर्ट में वामनदादा कर्डक सहित कुछ लोगों द्वारा लता मंगेशकर से आंबेडकर पर गीत गाने के लिए संपर्क किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी तरह लोकशाहीर संभाजी भगत ने भी सार्वजनिक रूप से इस संबंध में दावा किया है।
लेकिन इन दावों की पुष्टि के लिए लता मंगेशकर का स्वयं लिखा हुआ उत्तर, मूल पत्राचार, स्टूडियो रिकॉर्डिंग का दस्तावेज, समकालीन डायरी अथवा अन्य प्रमाणित प्राथमिक सामग्री उपलब्ध होना आवश्यक है। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि उन्होंने जातिगत कारणों से आंबेडकर का गीत गाने से इनकार किया, उपलब्ध सामग्री के आधार पर शोध-सम्मत नहीं होगा। अधिक सावधानीपूर्ण निष्कर्ष यही है कि इस संबंध में कुछ आंबेडकरवादी कलाकारों और शोधकर्ताओं के सार्वजनिक वक्तव्य मौजूद हैं, लेकिन निर्णायक प्राथमिक प्रमाण अभी सामने नहीं आया है।

वामनदादा कर्डक और आंबेडकरवादी संगीत परंपरा
वामनदादा कर्डक आंबेडकरवादी गीत परंपरा के महत्वपूर्ण नामों में रहे। उनकी रचनाओं में डॉ. आंबेडकर, बुद्ध, समानता, जाति-विरोध और आत्मसम्मान जैसे विषय प्रमुख रहे। उनकी गीत परंपरा सामाजिक आंदोलनों और आम लोगों तक पहुँची तथा बाद की पीढ़ियों के कलाकारों ने इसे आगे बढ़ाया।
इस संदर्भ में लता मंगेशकर और आंबेडकरवादी संगीत को केवल व्यक्तिगत तुलना या आरोप के रूप में देखने के बजाय भारतीय सांस्कृतिक संरचना के व्यापक संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी है। एक ओर फिल्म संगीत की व्यापक मुख्यधारा थी, तो दूसरी ओर सामाजिक परिवर्तन के लिए समुदाय द्वारा विकसित स्वतंत्र सांस्कृतिक परंपरा।

जाति और संगीत की सामाजिक संरचना
रासिका अजोतकर की 2019 की SOAS University of London की पीएचडी शोध Music and the Politics of Caste and Gender: Women’s Voices of Liberation in Western India भी जाति, संगीत और सामाजिक सत्ता के संबंधों पर महत्वपूर्ण दृष्टि प्रस्तुत करती है। इसमें भीमगीत, बुद्धगीत और विद्रोही शाहिरी को जाति-विरोधी वैकल्पिक संगीत परंपराओं के रूप में देखा गया है।
यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है कि संगीत में केवल आवाज सुनी जाती है या यह भी देखा जाता है कि वह आवाज किस सामाजिक अनुभव और पृष्ठभूमि से आ रही है। इस दृष्टि से संगीत का अध्ययन केवल कलाकार के जीवन और लोकप्रियता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जाति, वर्ग, लिंग, बाजार और सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका तक विस्तृत हो जाता है।

व्यापक लोकप्रियता को सीमित दायरे में नहीं बांधा जा सकता
लता मंगेशकर के गीतों को केवल किसी एक वर्ग तक सीमित बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। उनकी लोकप्रियता भारत के साथ-साथ पड़ोसी देशों और दुनिया के अन्य हिस्सों तक फैली थी। इसलिए अधिक सटीक शोध प्रश्न यह है कि इतनी व्यापक लोकप्रिय आवाज में भारत के जाति-विरोधी और आंबेडकरवादी सामाजिक संघर्षों को कितना प्रतिनिधित्व मिला।
यही प्रश्न संगीत के रिकॉर्ड, गीतों के विषय, सांस्कृतिक संस्थाओं और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर अधिक व्यवस्थित ढंग से जाँचा जा सकता है।

मुख्यधारा और प्रतिरोध की दो संगीत धाराएँ
भारतीय फिल्म संगीत ने प्रेम, परिवार, राष्ट्र, धर्म, प्रकृति और व्यक्तिगत भावनाओं की विशाल दुनिया को स्वर दिया। इसके समानांतर भीमगीतों ने सामाजिक समानता, शिक्षा, आत्मसम्मान, जाति-विरोध और मानव गरिमा जैसे सवालों को केंद्र में रखा।
आंबेडकरवादी संगीत परंपरा को इसी कारण एक वैकल्पिक सार्वजनिक सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में भी देखा गया है, जहाँ समुदाय ने अपनी स्मृति, पहचान और सामाजिक चेतना को स्वयं अभिव्यक्त किया।

सम्मान और सामाजिक प्रतिनिधित्व को अलग-अलग देखना जरूरी
लता मंगेशकर को भारत रत्न मिलना उनके संगीत योगदान को मिली सर्वोच्च राष्ट्रीय मान्यताओं में से एक था। लेकिन किसी कलाकार को प्राप्त राष्ट्रीय सम्मान को उसके सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
इसी तरह किसी कलाकार द्वारा किसी विशेष विषय पर गीत न गाना अपने आप में उस विषय के विरोध का प्रमाण भी नहीं है। इसलिए कलात्मक योगदान और सामाजिक न्याय के प्रश्नों का प्रतिनिधित्व—इन दोनों को अलग-अलग कसौटियों पर देखना अधिक उपयुक्त होगा।

अनुपस्थिति भी शोध का विषय
इस अध्ययन का महत्वपूर्ण पक्ष किसी कलाकार पर आरोप लगाने के बजाय उस सांस्कृतिक अंतर को समझना है, जिसमें एक ओर आंबेडकरवादी आंदोलन ने गीतों, शाहिरों, गायन मंडलियों और लोककलाकारों की स्वतंत्र परंपरा विकसित की, जबकि दूसरी ओर भारतीय फिल्म संगीत की अत्यंत प्रभावशाली आवाजों में आंबेडकरवादी गीतों का स्थापित उदाहरण सीमित दिखाई देता है।
यह स्थिति कई शोध प्रश्न सामने रखती है—भारतीय सांस्कृतिक मुख्यधारा किन आवाजों को व्यापक मंच देती है? किन सामाजिक संघर्षों को लोकप्रिय संस्कृति में स्थान मिलता है? किन समुदायों की स्मृतियाँ राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बनती हैं? और किन समुदायों को अपनी स्मृति और संघर्षों को सुरक्षित रखने के लिए स्वतंत्र सांस्कृतिक परंपराएँ विकसित करनी पड़ती हैं?

निष्कर्ष
लता मंगेशकर भारतीय संगीत की अत्यंत प्रभावशाली कलाकार थीं और उनके योगदान को भारतीय संगीत इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। साथ ही, उपलब्ध सामग्री के आधार पर उनके गीत-संसार में आंबेडकरवादी विषयों की सीमित उपस्थिति का अध्ययन भी एक स्वतंत्र शोध का विषय हो सकता है।
दूसरी ओर, आंबेडकरवादी समाज द्वारा विकसित भीमगीत, बुद्धगीत, शाहिरी और जनसंगीत की परंपरा यह दर्शाती है कि संगीत सामाजिक स्मृति, आत्मसम्मान, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
इसलिए इस विमर्श को किसी एक कलाकार के व्यक्तिगत मूल्यांकन तक सीमित करने के बजाय भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में प्रतिनिधित्व की व्यापक संरचना के संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दलित, आदिवासी, श्रमिक, महिला और अन्य वंचित समुदायों की सांस्कृतिक आवाजों को उनके अपने शब्दों, संगीत और परंपराओं सहित व्यापक राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श में पर्याप्त स्थान मिले।
प्रमुख शोध-संदर्भ:
प्रमोद रंजन — Social and Political Concerns of Lata Mangeshkar: An Ambedkarite Perspective, Contemporary Voice of Dalit, 2022।
जोएल कैबालियन एवं जूलियन जुगांद — Bhim Geet and the Ambedkarite Movement: The Genesis of a Cultural Field of Protest, South Asia Multidisciplinary Academic Journal, 2023/24।
रासिका अजोतकर — Music and the Politics of Caste and Gender: Women’s Voices of Liberation in Western India, SOAS University of London, 2019।
वामनदादा कर्डक एवं आंबेडकरवादी गीत-परंपरा से संबंधित मौखिक-इतिहास और अभिलेखीय सामग्री।
लता मंगेशकर–आंबेडकर गीत संबंधी डॉ. रविचंद्र हडसणकर एवं लोकशाहीर संभाजी भगत के सार्वजनिक वक्तव्य—द्वितीयक/मौखिक साक्ष्य के रूप में।

(श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर)

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