महिलाओं के भूमि अधिकार को कानून से वास्तविक नियंत्रण तक पहुंचाने की जरूरत: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे | New India Times

संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

महिलाओं के भूमि अधिकार को कानून से वास्तविक नियंत्रण तक पहुंचाने की जरूरत: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे | New India Times

महिलाओं के भूमि अधिकारों को केवल जमीन के स्वामित्व तक सीमित न रखकर उसे वास्तविक नियंत्रण, उपयोग, आय और निर्णय लेने की क्षमता से जोड़ने की जरूरत है। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और विशेष रूप से PVTG महिलाओं के संदर्भ में यह विषय और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यह बात 23 सितंबर को ग्वालियर में आयोजित “महिलाओं के भूमि अधिकारों पर राज्य स्तरीय परामर्श बैठक” के संकल्पना-पत्र एवं विमर्श में सामने आई।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे के शोधपरक अध्ययन के अनुसार ग्रामीण भारत में भूमि केवल कृषि उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा, आवास, आजीविका, खाद्य सुरक्षा, ऋण तक पहुंच और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी महत्वपूर्ण परिसंपत्ति है। कृषि, पशुपालन, बीज संरक्षण, लघु वनोपज संग्रहण तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद भूमि पर उनके स्वामित्व और वास्तविक नियंत्रण में अंतर दिखाई देता है।
अध्ययन में कहा गया है कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के बाद मिताक्षरा संयुक्त हिंदू परिवार में पुत्री को पुत्र के समान सहदायिक अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि कानूनी अधिकार मिलने के बाद भी उसका वास्तविक लाभ तभी सुनिश्चित हो सकता है, जब उत्तराधिकार की पहचान, बंटवारा, नामांतरण और राजस्व अभिलेखों का अद्यतन होने के साथ भूमि पर महिला का वास्तविक नियंत्रण भी स्थापित हो।
अध्ययन के मुताबिक मध्य प्रदेश में कृषि जनगणना 2015-16 के दौरान 11,88,621 महिला ऑपरेशनल होल्डर्स दर्ज किए गए थे और उनके द्वारा लगभग 15.08 लाख हेक्टेयर क्षेत्र संचालित किया जा रहा था। हालांकि ऑपरेशनल होल्डर होना कानूनी भूमि मालिक होने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। इसलिए महिला कृषि संचालक और महिला कानूनी भूमि मालिक के आंकड़ों को अलग-अलग दर्ज करने की आवश्यकता बताई गई है।
अनुसूचित जाति महिलाओं के संदर्भ में भूमि स्वामित्व, भूमिहीनता, उत्तराधिकार, नामांतरण और भूमि से प्राप्त आय पर नियंत्रण को प्रमुख मुद्दा माना गया है। वहीं अनुसूचित जनजाति महिलाओं के लिए भूमि के साथ जंगल, जल, चराई, लघु वनोपज, सामुदायिक वन संसाधन और ग्राम सभा में भागीदारी को भी भूमि अधिकार के व्यापक दायरे में शामिल करने की जरूरत बताई गई है।
वन अधिकार अधिनियम के तहत मध्य प्रदेश में 31 दिसंबर 2024 तक 6,27,513 वन अधिकार दावे दर्ज किए गए थे, जिनमें 5,85,326 व्यक्तिगत और 42,187 सामुदायिक दावे शामिल थे। इसी अवधि तक 2,94,877 अधिकार-पत्र वितरित किए गए थे। अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि ये आंकड़े महिला-विशिष्ट नहीं हैं, इसलिए इनके आधार पर महिला लाभार्थियों की वास्तविक स्थिति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए लिंग और सामाजिक श्रेणी के आधार पर अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध कराना आवश्यक है।
PVTG समुदायों के संदर्भ में Habitat Rights को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। अध्ययन के अनुसार विशेष रूप से सहरिया समुदाय की महिलाओं के लिए पारंपरिक आवास, जंगल, जल, लघु वनोपज, आजीविका और सामुदायिक संसाधनों को एकीकृत दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। Habitat Rights को आवास, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पोषण और आजीविका योजनाओं से जोड़ने पर इसका प्रभाव अधिक व्यापक हो सकता है।
अध्ययन में कहा गया है कि महिला भूमि अधिकार की वास्तविक स्थिति मापने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि जमीन किसके नाम दर्ज है। इसके साथ यह भी देखना होगा कि जमीन का उपयोग कौन करता है, उससे होने वाली आय पर किसका नियंत्रण है और भूमि संबंधी निर्णयों में महिला की कितनी भागीदारी है। इसी आधार पर “स्वामित्व + नियंत्रण + उपयोग + आय + निर्णय” को वास्तविक महिला भूमि अधिकार का आधार माना गया है।
अध्ययन में राज्य के लिए महिला भूमि अधिकार मिशन, जेंडर आधारित भूमि रिकॉर्ड, SC महिलाओं का भूमि सर्वेक्षण, FRA में महिला-विशिष्ट आंकड़े, PVTG Habitat Mapping, समयबद्ध नामांतरण, महिला कानूनी सहायता केंद्र, महिला भूमि हेल्पलाइन, ग्राम सभा में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी और महिला किसानों की स्वतंत्र पहचान सहित 20 सूत्रीय कार्ययोजना प्रस्तावित की गई है।
साथ ही प्रत्येक जिले में महिला भूमि अधिकार रिपोर्ट तैयार करने, भूमि अधिकार योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण कराने, विश्वविद्यालयों को शोध से जोड़ने तथा महिला स्वामित्व वाली भूमि को सिंचाई, बीज, तकनीक, ऋण, बाजार और बीमा जैसी सुविधाओं से जोड़ने पर जोर दिया गया है।
अध्ययन का निष्कर्ष है कि महिलाओं के भूमि अधिकार की अगली दिशा केवल “कानूनी अधिकार” तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे “वास्तविक नियंत्रण, आजीविका, आय और निर्णयकारी भागीदारी” तक पहुंचाना जरूरी है। अनुसूचित जाति महिलाओं के लिए उत्तराधिकार और स्वामित्व, अनुसूचित जनजाति महिलाओं के लिए भूमि एवं सामुदायिक संसाधन तथा PVTG महिलाओं के लिए Habitat Rights और महिला नेतृत्व को एकीकृत नीति के रूप में आगे बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है।

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