धनेली का इतिहास वर्तमान गांव से भी पुराना, पुरातात्विक साक्ष्यों ने बढ़ाई शोध की संभावनाएं | New India Times

संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

ग्वालियर के मुरार क्षेत्र में स्थित धनेली केवल एक सामान्य ग्रामीण बस्ती नहीं है। उपलब्ध पुरातात्विक प्रमाणों से संकेत मिलता है कि धनेली क्षेत्र में वर्तमान गांव के अस्तित्व से बहुत पहले भी मानव गतिविधियां मौजूद थीं। हालांकि, धनेली की वर्तमान ग्राम-बसाहट कब और किसके द्वारा स्थापित की गई, इसका निश्चित प्रमाण अभी उपलब्ध अभिलेखों में नहीं मिलता है।

इसी अंतर को समझना इस शोध का महत्वपूर्ण विषय है। पुरास्थल की प्राचीनता और वर्तमान गांव की स्थापना—इन दोनों को अलग-अलग प्रमाणों के आधार पर समझना आवश्यक है।

पुरातत्व में धनेली का महत्वपूर्ण उल्लेख

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वर्ष 1971-72 की वार्षिक रिपोर्ट में ग्वालियर और उसके आसपास के क्षेत्र में प्राचीन मानव-निवास स्थलों की खोज का उल्लेख मिलता है। इस सर्वेक्षण के दौरान ग्वालियर के उत्तर-पूर्व में लगभग 15 किलोमीटर के क्षेत्र में 25 से अधिक पुरास्थलों की पहचान की गई थी। इनमें धनेली को भी एक महत्वपूर्ण पुरास्थल के रूप में दर्ज किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, धनेली में उत्तरी काले चमकीले मृद्भांड (NBPW) के साथ बड़ी संख्या में सूक्ष्म पाषाण उपकरण (Microliths) मिले थे। ये उपकरण धनेली के मुख्य टीले से लगे एक बड़े पहाड़ी टीले की ढलानों से प्राप्त हुए थे।

यह तथ्य धनेली के इतिहास को सामान्य ग्राम-इतिहास से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।

काले-लाल मृद्भांड और प्राचीन मानव गतिविधि

वर्ष 2020 में प्रकाशित “Northern Black Polished Ware: A Gazetteer” में भी धनेली, ग्वालियर को एक पुरातात्विक स्थल के रूप में दर्ज किया गया है। इसमें धनेली के साथ काले-लाल मृद्भांड (BRW) और सूक्ष्म पाषाण उपकरणों का उल्लेख मिलता है। इसके स्रोत के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वर्ष 1971-72 की रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है।

इन प्रमाणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि धनेली क्षेत्र में प्राचीन मानव गतिविधियों के पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं। हालांकि, केवल इन पुरावशेषों के आधार पर यह कहना कि “आज का धनेली गांव उसी काल में बस गया था”, वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

वर्तमान धनेली गांव का अभिलेखीय प्रमाण

भारत सरकार की जनगणना के अभिलेखों में धनेली का उल्लेख कम से कम वर्ष 2001 की जनगणना में एक स्वतंत्र गांव के रूप में मिलता है। वर्ष 2001 के अभिलेख में धनेली का ग्राम कोड 00259000 दर्ज है।

वर्ष 2011 की जनगणना में भी धनेली को स्वतंत्र गांव के रूप में दर्ज किया गया है। इसमें इसका ग्राम कोड 453926 दिया गया है। वर्ष 2011 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार धनेली में 191 परिवार और कुल 958 की आबादी दर्ज थी।

इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में धनेली एक स्थापित जनगणना ग्राम है। हालांकि, जनगणना अभिलेखों से गांव की स्थापना की मूल तारीख या उसके प्रारंभिक बसाहट काल की जानकारी नहीं मिलती।

सबसे बड़ा शोध प्रश्न

अब तक उपलब्ध प्रमाणों से धनेली के इतिहास में दो अलग-अलग कालखंड दिखाई देते हैं।

पहला, धनेली क्षेत्र में प्राचीन मानव गतिविधियों और पुरातात्विक सामग्री के प्रमाण मिलते हैं।

दूसरा, आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में धनेली एक स्थापित ग्राम के रूप में दर्ज है।

इन दोनों कालखंडों के बीच की ऐतिहासिक कड़ी अभी शोध का विषय है। यही कारण है कि धनेली का इतिहास आगे के विस्तृत अध्ययन की मांग करता है।

वर्तमान बसाहट कब हुई?

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अभी धनेली की वर्तमान ग्राम-बसाहट का कोई निश्चित वर्ष या शताब्दी बताना संभव नहीं है।

इसके लिए निम्न अभिलेखों और स्रोतों की खोज आवश्यक होगी—

  • पुराने ग्वालियर राज्य के गजेटियर।
  • पुराने बंदोबस्त एवं राजस्व अभिलेख।
  • गांव के पुराने खसरा एवं खतौनी अभिलेख।
  • ग्वालियर रियासत के पुराने ग्राम-मानचित्र।
  • पुराने भूमि-अधिकार एवं पट्टा अभिलेख।
  • धनेली और आसपास के गांवों से संबंधित पुराने वंशावली अभिलेख एवं स्थानीय दस्तावेज।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की धनेली से संबंधित मूल रिपोर्ट एवं स्थल अभिलेख।

यदि इन अभिलेखों में धनेली का सबसे पुराना नाम, भूमि-मालिक, बसने वाले परिवार अथवा ग्राम-सीमा का उल्लेख मिल जाता है, तो वर्तमान ग्राम-बसाहट के काल का अधिक विश्वसनीय निर्धारण किया जा सकता है।

पुरातत्व और लोकस्मृति को साथ लेकर चलने की आवश्यकता

धनेली के इतिहास की खोज केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्थानीय बुजुर्गों, पुराने परिवारों और ग्राम समुदाय की मौखिक परंपराओं को भी व्यवस्थित रूप से दर्ज करना आवश्यक है।

इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—

  • धनेली में सबसे पहले किन परिवारों ने निवास किया?
  • वे लोग किस दिशा या क्षेत्र से यहां आए थे?
  • पुरानी बस्ती किस स्थान पर स्थित थी?
  • क्या वर्तमान गांव से पहले यहां कोई दूसरी बस्ती या टोला मौजूद था?
  • पहाड़ी, टीले, खेत और पुराने रास्तों के स्थानीय नाम क्या थे?
  • क्या किसी स्थान से पुराने सिक्के, बर्तन, ईंट या अन्य पुरावशेष प्राप्त हुए हैं?

इन सवालों के जवाबों को पुरातात्विक प्रमाणों के साथ जोड़कर देखने से धनेली के इतिहास की एक अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।

निष्कर्ष

धनेली का इतिहास केवल वर्तमान ग्राम-बसाहट से शुरू नहीं होता। वर्ष 1971-72 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सर्वेक्षण में धनेली से प्राप्त काले-लाल मृद्भांड, उत्तरी काले चमकीले मृद्भांड और सूक्ष्म पाषाण उपकरण इस क्षेत्र में प्राचीन मानव गतिविधियों के महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण हैं।

वहीं, आधुनिक सरकारी जनगणना अभिलेख धनेली को एक स्थापित ग्राम के रूप में दर्ज करते हैं।

इसलिए वर्तमान में उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर सबसे वैज्ञानिक निष्कर्ष यही है—

“धनेली क्षेत्र की प्राचीनता के पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध हैं, लेकिन वर्तमान धनेली गांव की स्थापना का निश्चित काल अभी शोध का विषय है।”

अतः धनेली-मुरार की बसाहट का वास्तविक इतिहास जानने के लिए पुरातत्व, राजस्व अभिलेख, गजेटियर, स्थानीय इतिहास और मौखिक परंपराओं—इन सभी स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।

यही विस्तृत अध्ययन यह निर्धारित करने में सहायता कर सकता है कि धनेली की वर्तमान ग्राम-बसाहट कितनी पुरानी है और क्या वर्तमान ग्राम-बसाहट के नीचे या आसपास किसी अधिक प्राचीन बस्ती की निरंतरता मौजूद है।

By nit

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