जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:

भोपाल नगर निगम पर गरीब और अस्थायी कर्मचारियों के साथ अन्याय और प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें बिना किसी नोटिस, बिना कारण बताए और झूठे आरोपों के आधार पर अचानक नौकरी से निकाल दिया जा रहा है। न तो बकाया वेतन का पूरा भुगतान किया जा रहा है और न ही किसी प्रकार का मुआवजा दिया जा रहा है।
कर्मचारियों के अनुसार, निगम में 25 या 29 दिन के अनुबंध पर काम कराया जाता है, जिससे स्थायी नियुक्ति का रास्ता बंद हो जाता है। इसके बाद मामूली या कथित आरोपों के आधार पर बिना चार्जशीट और बिना सुनवाई का मौका दिए सीधे सेवा समाप्त कर दी जाती है। कई कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों की सेवा के बाद एक दिन अचानक उन्हें यह कहकर हटा दिया जाता है कि “अब आपकी जरूरत नहीं है।”
एक प्रभावित कर्मचारी ने बताया कि वर्षों तक ईमानदारी से काम करने के बावजूद उसे झूठे आरोप में हटा दिया गया। घर में छोटे बच्चे हैं, पेंशन अधूरी है और वेतन भी पूरा नहीं मिला। न्याय के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर भी अधिकारी पेश नहीं होते, जिससे मामलों में लगातार तारीखें पड़ रही हैं और न्याय में देरी हो रही है।
बताया जा रहा है कि नगर निगम के हजारों अस्थायी, दैनिक वेतनभोगी और संविदा कर्मचारी इसी तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है, बच्चों की पढ़ाई रुक गई है और बुजुर्गों की दवाइयां तक बंद हो गई हैं। आवाज उठाने वाले कर्मचारियों पर और सख्त कार्रवाई या नए आरोप लगाए जाने का भी आरोप है।
कर्मचारी संगठनों ने मांग की है कि बिना नोटिस बर्खास्तगी पर तुरंत रोक लगाई जाए, बकाया वेतन और मुआवजा दिया जाए, अधिकारी नियमित रूप से अदालत में पेश हों और लंबित मामलों का जल्द निपटारा किया जाए। साथ ही पूर्ण पेंशन और नियमितीकरण की प्रक्रिया तेज करने की भी मांग उठाई गई है।
हालांकि, कर्मचारियों का आरोप है कि उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब तक गरीब कर्मचारियों के साथ इस तरह का व्यवहार जारी रहेगा और उन्हें न्याय कब मिलेगा।

