इमरान खान, भुसावल/जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले शिक्षकों पर इन दिनों गैर-शैक्षणिक कार्यों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। चुनाव, सर्वेक्षण, जनगणना और अब एसआईआर जैसे अभियानों में ड्यूटी लगने से स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
शिक्षकों का कहना है कि वे हमेशा सरकारी योजनाओं और अभियानों में पूरी निष्ठा से सहयोग करते आए हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें हर तरह के गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगातार व्यस्त रखा जाए। एसआईआर ड्यूटी के कारण कई स्कूलों में नियमित शिक्षण, मूल्यांकन और विद्यार्थियों के मार्गदर्शन जैसे जरूरी कार्य प्रभावित हो रहे हैं, जिसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति गुणवत्तापूर्ण और विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा पर जोर देती है, लेकिन शिक्षकों को बार-बार कक्षा से बाहर रखने की व्यवस्था इस उद्देश्य के विपरीत है। शिक्षक शिक्षा प्रक्रिया का मुख्य आधार हैं, इसलिए उन्हें उनकी मूल जिम्मेदारी अध्यापन पर ही केंद्रित रखा जाना आवश्यक है।
शिक्षक वर्ग ने मांग की है कि ऐसे अभियानों के लिए अलग से मानव संसाधन नियुक्त किए जाएं और शिक्षकों पर बढ़ते गैर-शैक्षणिक कार्यभार को कम करने के लिए ठोस नीति बनाई जाए। उनका कहना है कि यदि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना है तो शिक्षकों को कक्षा में अधिक समय देना ही सबसे प्रभावी कदम होगा: देवेंद्र तायडे, भुसावल

