वी.के. त्रिवेदी, ब्यूरो चीफ, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT:
पूर्व वर्षों की भांति इस वर्ष भी हाजी इक़बाल अकरम वारसी के दर-ए-दौलत पर शहीद-ए-कर्बला हज़रत इमाम हुसैन और शहीदान-ए-कर्बला की याद में एक भव्य मजलिस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की सदारत बाराबंकी के वरिष्ठ शायर हाजी नसीर अहमद अंसारी ने की, जबकि राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित अदील मंसूरी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन इक़बाल अकरम वारसी ने किया।
मजलिस का आगाज़ कारी सईदुर्रहमान, इमाम शाही मस्जिद दरगाह ने तिलावत-ए-कलाम-ए-पाक से किया। इसके बाद शायरों ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और शहीदान-ए-कर्बला की शान में अपने कलाम पेश कर ख़िराज-ए-अकीदत अर्पित किया।
हसन अंसारी ने पढ़ा—
“तमाम कायनात में मिसाल बेमिसाल है,
दिखाई जो कर्बला में आपने वफ़ा, हुसैन।”
सैफुल इस्लाम ‘सैफ’ ने कहा—
“तुम्हीं हो शान-ए-दीन की, तुम्हीं हो दीन की आबरू,
तुम्हीं से दीन-ए-मुस्तफ़ा हुआ हरा-भरा, हुसैन।”
हसरत सफीपुरी का कलाम कारी सईदुर्रहमान ने पेश किया—
“हर एक दिल है ग़मज़दा, ज़ुबां-ज़ुबां है तज़किरा,
शहादतों की आबरू, शहीद-ए-कर्बला हुसैन।”
नाज़िम-ए-मजलिस इक़बाल अकरम वारसी ने कहा—
“मुहब्बतों का, अम्न का, वफ़ा का रास्ता हुसैन,
शहादतों की आबरू, शहीद-ए-कर्बला हुसैन।”
सदारत कर रहे हाजी नसीर अहमद अंसारी ने अपने कलाम में कहा—
“वो होंगे और जो तलाश-ए-राहबर में खो गए,
हमें हैं काफ़ी आप ही के सिर्फ़ नक्श-ए-पा, हुसैन।”
मुख्य अतिथि अदील मंसूरी ने पढ़ा—
“नवासा-ए-शाह-ए-उमम हैं, शहज़ादा-ए-हरम,
शहादतों की आबरू, शहीद-ए-कर्बला हुसैन।”
इरफ़ान बारांकवी ने कहा—
“बुरा कहे, भला कहे, अब इसको कोई कुछ कहे,
करेंगे हम तो आपका सदा ही तज़किरा, हुसैन।”
डॉ. दाऊद मलिहाबादी ने पढ़ा—
“मैं क्यों डरूँ किसी से, मेरा नाम ही अली है जब,
अली ख़ुदा के शेर हैं और एक ज़लज़ला हुसैन।”
अहमद फ़राज़ का मशहूर शेर भी पेश किया गया—
“कोई सियाहकार है, कोई सरापा नूर है,
दो ही सूरतें रविश की—या यज़ीद, या हुसैन।”
इस अवसर पर शकील खान, सागर, अय्यूब अंसारी, बशर हरगांव, रिज़वान मारूफ वारसी, उमर हनीफ़, निहाल रज़ा लखीमपुरी, हारुन वारसी, सज्जादा नशीन हसीन वारसी, मुहम्मद ज़ीशान खुर्रम, हाजी शफीक अहमद, जुनैद अहमद, अबुज़र इब्न खान सहित बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे। अंत में दुआ के साथ मजलिस का इख्तिताम हुआ।
