वर्षितप आराधना के 100 दिन पूर्ण, व्होरा परिवार ने लिया तप अनुमोदना का पुण्य लाभ | New India Times

रहीम शेरानी हिंदुस्तानी/पंकज बड़ोला, झाबुआ (मप्र), NIT:

वर्षितप आराधना के 100 दिन पूर्ण, व्होरा परिवार ने लिया तप अनुमोदना का पुण्य लाभ | New India Times

जैन समाज की प्राचीन तप परंपरा वर्षितप आराधना के तहत थांदला नगर में चल रहे सामूहिक वर्षितप के 100 दिन पूर्ण होने पर धार्मिक वातावरण उत्साह और श्रद्धा से सराबोर रहा। प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के काल से चली आ रही इस आराधना को नगर में पूज्य जैनाचार्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. की पुण्य स्मृति में पूज्य श्री धर्मदास गण परिषद के आह्वान पर अणु शताब्दी वर्ष की अष्टवर्षीय आराधना क्रम में आयोजित किया जा रहा है।
कार्यक्रम पूज्य श्री जिनेन्द्रमुनिजी की आज्ञानुवर्ती महासती पूज्या श्री निखिलशीलाजी म.सा., पूज्या श्री दिव्यशीलाजी म.सा., पूज्या श्री प्रियशीलाजी म.सा. एवं पूज्या श्री दीप्तिश्री म.सा. के पावन सानिध्य में संपन्न हुआ। नगर में करीब 90 तपस्वी वर्षितप आराधना कर रहे हैं, जिनकी साधना के 100 दिन पूर्ण होने पर विशेष पारणा आयोजन किया गया।
इस अवसर पर पारणा कराने का सौभाग्य थांदला श्रीसंघ के पूर्व परामर्शदाता चतर्भुज व्होरा परिवार के लघु पुत्र रमेशचंद्र व्होरा को प्राप्त हुआ। व्होरा परिवार की ओर से तपस्वियों को विधि-विधान से आहार करवाकर एवं प्रभावना प्रदान कर तप अनुमोदना का लाभ लिया गया। परिवार की श्रीमती अंगूरबाला, स्नेहलता, पुखराज, रीता, सपना एवं राखी सहित कई सदस्य स्वयं भी वर्षितप आराधना में संलग्न हैं।
कार्यक्रम में महेश, आशीष, नितेश, निखिल, पार्षद अखिल, मयंक, दिव्यांश, विनीता, खुशबू, रानू, दृष्टि, देशना, सावी, धरा सहित परिवारजन एवं समाज के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
सेवा व पारणा में समाजजनों का उत्साह
श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया, सचिव हितेश शाह एवं प्रवक्ता पवन नाहर ने बताया कि वर्षितप आराधना के दौरान तपस्वियों के पारणा का लाभ लेने के लिए समाज में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। कई परिवार अपने शुभ अवसरों को तपस्वियों की सेवा और अनुमोदना से जोड़ रहे हैं। वहीं पुष्पा घोड़ावत, किरण श्रीश्रीमाल, दिलीप शाह, संजय व्होरा, प्रवीण पालरेचा, प्रवीण मेहता, कमलेश कुवाड़, राकेश श्रीमाल, राजेश सेठिया, रवि लोढ़ा, अखिल श्रीश्रीमाल एवं कपिल पीचा सहित अनेक सेवादार निरंतर सेवाएं दे रहे हैं।
यह परंपरा जहां धार्मिक संस्कारों को सुदृढ़ कर रही है, वहीं नई पीढ़ी को भी जैन धर्म की तप, संयम और त्याग की शिक्षाओं से जोड़ने का कार्य कर रही है।

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