धुलेंडी पर मनाई जाती है अनोखी ‘गल बाबजी’ परंपरा, झाबुआ अंचल की आदिवासी आस्था की अनमोल धरोहर | New India Times

रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी/पंकज बड़ोला, झाबुआ (मप्र), NIT:

धुलेंडी पर मनाई जाती है अनोखी ‘गल बाबजी’ परंपरा, झाबुआ अंचल की आदिवासी आस्था की अनमोल धरोहर | New India Times

झाबुआ अंचल मध्य भारत का वह क्षेत्र है, जो आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां ‘गल बाबजी’ की लोक परंपरा हजारों वर्षों से जीवित है। यह परंपरा आदिवासी समाज की आत्मीयता, श्रद्धा और सामाजिक एकजुटता का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

धुलेंडी पर मनाई जाती है अनोखी ‘गल बाबजी’ परंपरा, झाबुआ अंचल की आदिवासी आस्था की अनमोल धरोहर | New India Times

गल बाबजी कौन हैं?

झाबुआ अंचल के लगभग हर गांव में गल बाबजी की पूजा की जाती है। इनके लिए लकड़ियों से मचाननुमा ढांचा बनाया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार, गल बाबजी को भक्त प्रहलाद का प्रतीक माना जाता है, जो लोगों के मन में विश्वास, समर्पण और आशा की भावना जगाते हैं।

धुलेंडी पर मनाई जाती है अनोखी ‘गल बाबजी’ परंपरा, झाबुआ अंचल की आदिवासी आस्था की अनमोल धरोहर | New India Times

इस पर्व की खास बात यह है कि इसे धुलेंडी के दिन, यानी होली के अगले दिन मनाया जाता है। लोक कथाओं और गीतों के आधार पर भी गल बाबजी को भक्त प्रहलाद का अंश या प्रतीक माना जाता है।

मन्नत की परंपरा

जब किसी व्यक्ति को बीमारी या किसी प्रकार की समस्या होती है और वह डॉक्टर, वैद्य या अन्य उपायों से निराश हो जाता है, तब वह गल बाबजी के सामने मन्नत मांगता है।
मन्नत पूरी होने पर वह व्रत-उपवास रखकर संकल्प लेता है कि होली के एक दिन बाद गल बाबजी को बकरे की बलि अर्पित करेगा।

मन्नतधारी हल्दी लगाकर लाल-सफेद वस्त्र धारण करते हैं और परिवार के साथ विशेष रीति-रिवाजों के अनुसार तैयार होकर गल बाबजी के स्थान पर पहुंचते हैं।

पर्व का महत्वपूर्ण दिन

धुलेंडी के दिन दोपहर करीब 12 बजे से मन्नतधारियों का आना शुरू हो जाता है। हाथ में नारियल लिए मन्नतधारी गल देवता के मचाननुमा स्थान पर पहुंचते हैं, जो जमीन से लगभग 25 से 30 फीट ऊंचा होता है।

वहां ढोल-मांदल की थाप पर लोग गीत गाते और नृत्य करते हुए एकत्रित होते हैं। इसके बाद मन्नतधारी पूरी श्रद्धा के साथ बकरे की बलि अर्पित करते हैं। बकरे को गल बाबजी के मचान पर चढ़ाया जाता है।

इसके बाद मन्नतधारी को गल बाबजी के चारों ओर सात बार घुमाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ संपन्न होती है। इस अनोखे पर्व में पूरा गांव एकजुट होकर भाग लेता है।

परंपरा का ऐतिहासिक महत्व

यह परंपरा आदिवासी समाज में हजारों वर्षों से चली आ रही है। गल बाबजी की पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, मानवता और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का प्रतीक भी है।

यह पर्व यह संदेश देता है कि कठिनाइयों के समय में भी विश्वास, सहयोग और धैर्य से हर समस्या का समाधान संभव है।

समाज और संस्कृति का संगम

झाबुआ अंचल की गल बाबजी परंपरा आदिवासी समाज की श्रेष्ठ लोक परंपराओं में से एक मानी जाती है। यह पर्व सांस्कृतिक आस्था, सामाजिक एकता और जनमानस के विश्वास का अद्भुत उदाहरण है।

यहां हर पीढ़ी अपने पूर्वजों से इस विरासत को ग्रहण करती आ रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी जड़ों और अस्मिता से जुड़ी रहें।

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