निःस्वार्थ साहस और सेवा का प्रतीक अनिल सांबारे को मिला "जीवन रक्षा पदक" | New India Times

मोहम्मद सिराज, ब्यूरो चीफ, पांढुर्णा (मप्र), NIT:


जब साहस, संवेदना और समर्पण एक ही व्यक्तित्व में साकार हो जाते हैं, तब वह व्यक्ति समाज के लिए प्रेरणापुंज बन जाता है। ऐसे ही कर्मयोगी हैं श्री अनिल सांबारे (उम्र 64 वर्ष), जो शासकीय सी.एम. राइज शाला, पांढुरना से गणित विषय के व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने न केवल श्रेष्ठ अध्यापन किया, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाई, वह एक आदर्श शिक्षक रहे है।

दिनांक 31 अगस्त 1989 एवं 5 मार्च 1990 को घटित दो पृथक-पृथक घटनाओं में, श्री सांबारे ने अदम्य साहस, त्वरित निर्णय क्षमता और मानवीय संवेदना का अद्वितीय परिचय देते हुए डूब रहे पाँच व्यक्तियों के प्राणों की रक्षा की। उनके इस वीरतापूर्ण और मानवतावादी कार्य की उच्चतम स्तर पर सराहना करते हुए, भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा उन्हें “जीवन रक्षा पदक” से सम्मानित किया गया। यह गौरवशाली सम्मान उन्हें गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी 1993 के अवसर पर प्रदान किया गया।
नदी तट के समीप निवास करने वाले श्री सांबारे ने बचपन से ही अनेक लोगों को डूबने से बचाकर जीवनदान दिया है। समाजसेवा उनके लिए केवल दायित्व नहीं, बल्कि जीवन-धर्म रही है। सेवा के इसी पावन मार्ग पर चलते हुए वे स्वयं शारीरिक रूप से विकलांग भी हुए—जबड़ा टूटना, बारह दाँतों का गिरना जैसे गंभीर कष्ट सहने पड़े—परंतु उनके सेवा-संकल्प में कभी भी शिथिलता नहीं आई।
श्री सांबारे सदैव शासन, प्रशासन और आम जनता के बीच एक सशक्त सेतु बनकर खड़े रहे हैं। प्रशासन और जनता के बीच टकराव की परिस्थितियों में उन्होंने सदैव अग्रिम पंक्ति में रहकर समाधान और सहायता की भूमिका निभाई। सामाजिक दायित्व निभाते हुए उन्होंने कई चोर-उचक्कों को स्वयं प्रेरणा से चिन्हित कर पुलिस के हवाले किया, जिससे समाज में कानून और व्यवस्था सुदृढ़ हुई।

आज भी उनका संकल्प अडिग है और भविष्य में भी वे समाजसेवा के इस पावन पथ पर निरंतर अग्रसर रहने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध हैं।
ऐसे वीर सपूत का जीवन यह स्पष्ट संदेश देता है कि सच्चा देशप्रेम पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि निःस्वार्थ कर्म, साहस और मानवता की रक्षा से प्रकट होता है।

“जीवन रक्षा पदक” से सम्मानित किए जाने का वह क्षण आज भी अंचलवासियों के लिए गौरव का विषय है। 26 जनवरी 1993 के गणतंत्र दिवस समारोह में जब उन्हें इस गौरवपूर्ण पदक से अलंकृत किया गया, तो समूचा क्षेत्र गर्व और उल्लास से अभिभूत हो उठा था।

इस अवसर पर श्री अनिल सांबारे ने भावपूर्ण शब्दों में कहा—
“मुझे अपने भारत देश पर गर्व है। सेवा का यह संकल्प सेवानिवृत्ति के बाद भी नहीं थमेगा। जब तक श्वास है, मैं जनसेवा के पथ पर अडिग रहूँगा
निस्संदेह, श्री अनिल सांबारे का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, कर्तव्यनिष्ठा और निःस्वार्थ सेवा का एक अनुपम आदर्श बना रहेगा।
मोहम्मद सिराज
ब्यूरो चीफ़ NIT पांढुर्णा MP

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