सहदेईया गांव में धूमधाम से मनाया गया ज्योतिबा राव फुले की जयंती | New India Times

निहाल चौधरी, इटवा/सिद्धार्थ नगर (यूपी), NIT:

सहदेईया गांव में धूमधाम से मनाया गया ज्योतिबा राव फुले की जयंती | New India Times

शुक्रवार रात्रि में भनवापुर विकास खण्ड के सहदेईया गांव में महात्मा ज्योतिबा राव फुले की जयंती बडे ही हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। अनुयायियों ने ज्योतिबा फुले के साथ गौतम बुद्ध एवं बाबा साहब के चित्र पर पुष्प अर्पित किया।सुप्रसिद्ध मिशन गायिका मालती राव एवं प्रियंका राज के समाजसुधार गीतों पर रातभर झूमते दिखे श्रोता।
मुख्य अतिथि के रूप मे मौजूद भारतीय बौद्ध महासभा के जिलाध्यक्ष राममिलन गौतम ने बताया कि जोतिराव फुले का जन्म 11अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे मे हुआ था। वे जाति के माली थे। फुले एक भारतीय समाज सुधारक, समाज प्रबोधक, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे।
विशिष्ट अतिथि डा जेपी बौद्ध ने कहा कि फुले जी १८७३ में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया। महिलाओं व दलितों के उत्थान के लिय इन्होंने अनेक कार्य किए। समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समथर्क थे। वे भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के विरुद्ध थे।
एमपीपी इण्टर कालेज के प्रवक्ता राम आशीष वरूण ने कहा कि १९ वी सदी में स्त्रियों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। महात्मा फुले महिलाओं को स्त्री-पुरुष भेदभाव से बचाना चाहते थे। उन्होंने कन्याओं के लिए भारत देश की पहली पाठशाला पुणे में खोली।
तहसील अध्यक्ष इटवा अनिल कुमार गौतम ने कहा कि स्त्रियों की तत्कालीन दयनीय स्थिति से महात्मा फुले बहुत व्याकुल थे, इसीलिए उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाकर ही रहेंगे। इसलिए उन्होंने अपनी धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले को स्वतः शिक्षा प्रदान की। इस तरह सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला अध्यापिका बनी।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए जयकिशोर गौतम ने कहा कि सन 1873 में महात्मा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी और इसी साल उनकी पुस्तक “गुलामगिरी” का प्रकाशन भी हुआ था। दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया। महात्मा फुले की किताब ‘गुलामगिरी’ बहुत कम पृष्ठों की एक किताब है, लेकिन इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र ‘गुलामगिरी’ में ढूंढ़े जा सकते हैं।1890 ई. में महान् समाज सेवी ज्योतिबा फुले का देहांत हो गया था।
इस अवसर हरीराम बौद्ध, अवधेश कुमार राही, राजेश गौतम, मनीराम गौतम, सचिन भाष्कर,अभय कुमार आजाद, कल्लू बौद्ध, रामचन्द्र, राम बुझारत, राम अचल, विजय कुमार, रोहित, पुनीत गौतम, यशवंत सिंह यादव, संजीत कुमार, घनश्याम गौतम, बजरंगी, किशन जाटव, विनोद, गौतम भाई, तिलकराम, राम उग्गर, महेश, त्रिभवन, अनिल, विशाल, रामपाल, श्यामदेव आदि सहित भारी संख्या मे महिलाएं एवं बच्चे मौजूद रहे।

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