विशेष आलेख: वर्तमान में गोवर्धन पूजा की प्रासंगिकता…

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हरकिशन भारद्वाज, सवाई माधोपुर/जयपुर (राजस्थान), NIT:

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा पर गोवर्धन पूजा पर्व मनाया जाता है। इस पर्व की कथा श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है। श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में गोवर्धन नामक पर्वत की पूजा की परंपरा शुरू की थी। दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के साथ ही अन्नकूट का पर्व भी मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा के द‍िन तेल मालिश कर स्नान करने की भी परंपरा है।

पूजा के लिए गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की पुरुषाकृति बनाई जाती है। प्रतीक रूप में गोवर्धन तैयार कर वहां भगवान श्रीकृष्ण का विग्रह रखकर पूजा करें। इस दिन गायों को सजाने की भी परंपरा है। इस दिन गाय के सींग पर घी लगाने और उनकी आरती उतारकर गाय को गुड़ खिलाने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होती हैं।

कथा

द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र की पूजा करने की बजाए लोगों को गोवर्धन पर्वत की पूजा के लिए प्रेरित किया। इससे इंद्र गुस्सा हो गए और उन्होंने वृंदावन क्षेत्र में भयंकर बारिश करा दी जिससे बर्बादी होने लगी। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर बाढ से लोगों की रक्षा की। तभी से यह पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई।

मुहूर्त

सवाई माधोपुर खेरदा निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित ताराचंद शास्त्रि जी बताते हैं कि इस बार 15 नवंबर को गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन उदया तिथि अमावस्या सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक रहेगी। इसके बाद प्रतिपदा तिथि प्रारंभ हो जाएगी। आज अपरान्ह 03.19 बजे से शाम 05 .27 म‍िनट तक गोवर्धन पूजा का मुहूर्त रहेगा।

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