शरद पूर्णिमा विशेष: शरद पूर्णिमा पर अमृत सिद्धि योग…चंद्र किरणों से बरसेगा अमृत…।

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हरकिशन भारद्वाज, ब्यूरो चीफ, सवाई माधोपुर (राजस्थान), NIT:

30 अक्टूबर (शुक्रवार) को शरद पूर्णिमा है। यह रात कई मायने में महत्वपूर्ण है। जहां इसे शरद ऋतु की शुरुआत माना जाता है वहीं माना जाता है कि इस रात को चंद्रमा संपूर्ण 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और अपनी चांदनी में अमृत बरसाता है। इसी वजह से लोग इस पूरी रात्रि को खीर बनाकर चांदनी में रख देते हैं ताकि उसे प्रसाद के रूप में सुबह स्नान करके खाने के बाद निरोग हो पाएं।

शरद पूर्णिमा का महत्व

शरद पूर्णिमा काफी महत्वपूर्ण तिथि है, इसी तिथि से शरद ऋतु का आरम्भ होता है। इस दिन चन्द्रमा संपूर्ण और सोलह कलाओं से युक्त होता है।
इस दिन चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है जो धन, प्रेम और सेहत तीनों देती है। प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण कृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था।
इस दिन विशेष प्रयोग करके बेहतरीन सेहत, अपार प्रेम और खूब सारा धन पाया जा सकता है ।

शरद पूर्णिमा व्रत विधि

पूर्णिमा के दिन सुबह इष्ट देव का पूजन करना चाहिए।
इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी के दीपक जलाकर उसकी गन्ध पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए।
ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रुप से किया जाता है। इस दिन जागरण करने वालों की धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।

रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए। मंदिर में खीर आदि दान करने का विधि-विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चांद की चांदनी से अमृत बरसता है।

शरद पूर्णिमा पर पूजा करने से क्या होता है लाभ

  1. शरद पूर्णिमा की रात जब चारों तरफ चांद की रोशनी बिखरती है उस समय मां लक्ष्मी की पूरा करने आपको धन का लाभ होगा।
  2. मां लक्ष्मी को सुपारी बहुत पसंद है। सुपारी का इस्तेमाल पूजा में करें। पूजा के बाद सुपारी पर लाल धागा लपेटकर उसको अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि से पूजन करके उसे तिजोरी में रखने से आपको धन की कभी कमी नहीं होगी।
  3. शरद पूर्णिमा की रात भगवान शिव को खीर का भोग लगाएं। खीर को पूर्णिमा वाली रात छत पर रखें। भोग लगाने के बाद उस खीर का प्रसाद ग्रहण करें। उस उपाय से भी आपको कभी पैसे की कमी नहीं होगी।
  4. शरद पूर्णिमा की रात को हनुमान जी के सामने चौमुखा दीपक जलाएं। इससे आपके घर में सुख शांति बनी रहेगी। हिंदु धर्म की मान्यता एवं शास्त्रों में भी लिखा है, कि शरद पूर्णिमा पर रात को निकलने वाली चांद की किरणें स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं। दमा, श्वास व एलर्जी जैसे रोगों के लिए यह किरण कारगर साबित होती हैं।

शरद पूर्णिमा पर अमृतसिद्धि योग में चंद्र किरणों से बरसेगा अमृत

खेरदा सवाई माधोपुर निवासी पंडित ताराचंद जी शास्त्रि ने बताया कि आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस दिन धवल चांदनी में चंद्रमा अमृत की किरण बरसाता है। इस समय चंद्रमा धरती के एकदम नजदीक रहता है। शरद पूर्णिमा पर भक्त अपने इष्ट और आराध्य को खीर का भोग लगाते हैं ।धर्म, अध्यात्म व आयुर्वेद की दृष्टि यह दिन विशेष माना जा रहा है। इस दिन मध्यरात्रि में चंद्रमा की रोशनी में केसरिया दूध व खीर प्रसादी रखने तथा मध्यरात्रि के उपरांत सेवन करने की परंपरा है।
मान्यता है इससे रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है तथा मनुष्य वर्षभर निरोगी रहता है।

पंडित ताराचंद जी शास्त्री के अनुसार 30 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा शुक्रवार के दिन है। संयोग से इस दिन मध्यरात्रि में अश्विनी नक्षत्र रहेगा। 27 योगों के अंतर्गत आने वाला वज्रयोग, वाणिज / विशिष्ट करण तथा मेष राशि का चंद्रमा रहेगा।
वर्षों बाद आ रहे ऐसे संयोग में आयु व आरोग्यता के लिए आयुर्वेद का लाभ लिया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग योग संयोग का उल्लेख है। इनमें अमृतसिद्घि, सर्वार्थसिद्घि, त्रिपुष्कर, द्विपुष्कर या रवियोग विशिष्ट योग माने गए हैं। शरदपूर्णिमा पर मध्यरात्रि में शुक्रवार के साथ अश्विनी नक्षत्र होने से अमृतसिद्घि योग बन रहा है। इस योग में विशेष अनुष्ठान, जप, तप, व्रत किया जा सकता है।

शुक्रवार को शरद पूर्णिमा इसलिए मनेगी

शुक्रवार को पूर्णिमा तिथि सायंकाल काल 5.50 से शुरू होगी जो शनिवार को रात्रि 8.20 तक रहेगी। शरद पूर्णिमा रात्रिकालीन पर्व है इसलिए पूर्णिमा तिथि शुक्रवार की रात में रहने से शरद पूर्णिमा शुक्रवार की रात को मनाई जाएगी। सत्यनारायण भगवान का व्रत शनिवार को होगा ।

मोह रात्रि की मान्यता

पौराणिक मान्यता में तीन रात्रि विशेष मानी गई हैं। इनमें मोहरात्रि, कालरात्रि तथा सिद्धरात्रि विशेष है। शरद पूर्णिमा को मोह रात्रि कहा गया है। इसका उल्लेख श्रीमद्देवीभागवत के शिव लीला कथा में मिलता है। कथानक के अनुसार शरद पूर्णिमा पर महारास के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने शिव पार्वती का निमंत्रण भेजा। माता पार्वती ने जब शिव से आज्ञा मांगी, तो शिव ने मोहित होकर स्वयं ही वहां जाने की इच्छा वयक्त की। इसलिए इस रात्रि को मोह रात्रि भी कहा जाता है।

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