दशहरा विशेष: अब राम कहां से आएंगे…???

देश, समाज

हरकिशन भारद्वाज, ब्यूरो चीफ, सवाई माधोपुर (राजस्थान), NIT:

आज दशहरा है और हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी हम बुराई और असत्य के प्रतीक रावण के पुतले का दहन करेंगे। हम सदियों से राक्षसी वृति के प्रतीक रावण के पुतले का कभी वध कर, कभी फूंक कर बुराई का अंत कर दशहरा मनाते आ रहे हैं। रावण का पुतला फूंकना तो बुराई के अंत का प्रतीक मात्र है। दिन- ब- दिन समाज में सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रही राक्षसी वृति का पुतला कौन फूंकेगा? क्या हमें दशहरे पर इस बारे में विचार नहीं करना चाहिए बताइये ….? क्रोध, छल, कपट, कलह, द्वेष, अत्याचार, अनाचार, अपहरण, बलात्कार, अबोध बालिकाओं के प्रति अमानवीय व्यवहार, हत्या आदि राक्षसी वृतियां जिस तेजी से निरन्तर बढ़ रही हैं इसके जिम्मेदार कौन हैं ? आखिर हम किसका पुतला फूंके?
आज समाज में जिस प्रकार इन राक्षसी वृत्तियों ने हिंसक और विकराल रूप धारण कर लिया है उन्हें देख कर रावण जिंदा होता तो वह भी शर्मशार हो जाता। रावण ने अपनी बहन सूर्पनाखा की नाक काटने मात्र से ही पहले तो छल से सीता का हरण कर लिया फिर उस पर मुग्ध होकर अपनी भार्या बनाने का कुप्रयास किया।इस निंदनीय कृत्य का एक उजला पहलू भी है कि रावण ने कभी सीता के साथ किसी किस्म का निंदनीय व्यवहार नहीं किया। उस काल के रावण की राक्षसी वृति की जगह आज को देखें तो हमें अपने आप पर ग्लानि नहीं होनी चाहिए क्या ….बताइए?
जिस प्रकार का विभत्स रूप सामने आ रहा है, यह बताने को पर्याप्त है कि किस प्रकार के राक्षस बनते जा रहे हैं हम…!
रावण के अपराध के लिए तो भगवान राम ने उसका वध कर बुराई, अधर्म, अहंकार और पाप का अंत कर दिया।
जब हज़ारों वर्ष पूर्व रावण और बुराइयों का अंत हो गया तो फिर कैसे समाज में फिर से रावण और राक्षसी वृतियाँ पनप गईं?
अब कौन करेगा इनका अंत….? आज के रावणों ने समाज को इतना कलुषित कर दिया हैं कि इन के अंत होने का कोई ओर-छोर ही नज़र नहीं आता है।
आज चारों और मानवीय एवं सामाजिक बुराइयां और अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हो रही हैं। समाज में व्याप्त ऐसी कई बुराइयों के पीछे हमारा लालच, लोभ, मोह, मानसिक मनोवृति, मनोभावनाएँ आदि ही प्रमुख कारण हैं जिनसे उपजी राक्षसी वृति के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं कोई दूसरा नहीं।
अब राम कहाँ से आएंगे इन पापियों और बुराइयों का अंत करने के लिए। हमें स्वयं ही अपने मन के रावण को मारना होगा। मनोवृतियों और सोच को बदलना होगा। यह हमें ही सोचना होगा कि हम कैसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं।
हमें सामाजिक आदर्शों,मूल्यों,नैतिकता के सिद्धांतों पर स्वयं भी चलना होगा और नई पीढ़ी को भी इसके लिए मार्ग दर्शन देना होगा।माता-पिता जो अपनी भूमिका भूल गए हैं, जिससे बच्चें प्रारम्भ से ही नैतिक आदर्श पर चलने के लिए तैयार होते थे, को फिर से जागना होगा।
इन वृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए हमें बने हुए सरकारी कानून को भी प्रभावी बनाना होगा, जिससे उनका मखोल न उड़े । समाज में बढ़ते रावणों और आसुरी वृत्तियों का अंत करने के लिए हमें जागरूक होना होगा,बच्चों में संस्कार पैदा करने होंगे, नियम ज्यादा कठोर बनाने होंगे, सख्ती से इनकी पालना पर जोर देना होगा एवं मीडिया को जागरूकता का माहौल बनाने में आगे आना होगा। एकजुट होकर प्रयास कर मन के रावण को मारने से ही कुछ बात बनेगी। आइये दशहरे पर इस बार मन के रावण को मारने का संकल्प लेवें।

?आप सभी को विजयदशमी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं?

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